(मनोज)
खेतों के अस्थिपंजर के रूप में फैली-बिखरी पतली मोटी मेड़ें एक दूसरे को समकोण, न्यूनकोण व अधिककोण पर छू-छू कर दूर भागती, पुनः आगे किसी दूसरी मेड़ का स्पर्श लेकर विभिन्न दिशाओं में अनुगमन करती सम्पूर्ण सीवान को एक कंकालीय जामा पहना रही है। सीवान के बीचो बीच से गुजरता माइनर मुख्य धमनी उससे जुड़ी छोटी-छोटी नालियां सहायक धमनियों के रूप में बिछी है। माइनर के अगल-बगल दो मोटी-मोटी मेड़ें कशेरूक दण्ड के रूप में सम्पूर्ण सीवान को एक जीवधारी का स्वरूप प्रदान कर रही है। मेड़ों पर उगी दूब घस व कहीं कहीं पुंज के रूप में कुश व अन्य विभिन्न घासों के पत्त्यिों पर ओस की नन्हीं-नन्हीं सुकुमार बूॅंदें मंद-मंद हवाओं के झोंके से ऐसे हिल रही हैं जैसे माॅं की गोंद में कोई नन्हा अठखेलियाॅं कर रहा हो।
प्ूारब की ओर क्षितिज के पास खून के धब्बे के रूप में छोटे-छोटे बादल के टुकड़े स्पष्ट रूप से किसी के आगमन की पूर्व सूचना दे रहे हैं। पल हर पल जैसे कोई खून के इन धब्बों को किसी अदृश्य हाथ से धूलता सजा रहा हो। दूर क्षितिज के पास स्थित गाॅंव की काली लाल धूंधली छाया के ऊपर एक रक्त वर्ण रोटी के टुकड़े के समान आगंतुक का आगमन हो रहा है। जो क्षण पतिक्षण विभिन्न रूपों का ग्रहण कर रहा है, टुक्का से आधी से क्रमशः पुरी की तरफ अग्रसर। जिसके बढ़ते तेज का प्रभाव स्पष्ट रूप से ओस की नन्हीं-नन्हीं बूॅंदों के तेज पर पड़ रहा है, वे और ऊर्जावान और तेजवान होकर और चमकदार हो रही हैं।
परंतु इन मेड़ों पर बढ़ते दो बुढ़े नंगे पैर, जिनमे ताल की मिट्टी की तरह अनगिनत दरारें पड़ी हैं इन नवजात मासूम बुंदों के अस्तित्व को समाप्त करते चले जा रहे हैं। एक छोटे से चार विस्वा जमीन के टुकड़े केा घेरे हुए लकीर की तरह पतली मेड़ों पर उगी घासों के गोंद में झूलते इन बूंदों के अस्तित्व को समाप्त करने के बाद दोनों पैर थके से खेत मेें ऐसे प्रवेश किए जैसे किसी युद्ध भूमि में किसी बृद्ध किन्तु अनुभवी योद्धा के पैर। परंतु ये पैर किसी रणभूमि के योद्धा के नहीं बल्कि कर्मभूमि के एक बृद्ध योद्धा ”सरन“ के हैं। घुटने से ऊपर मटमैली सिकुड़ी, उसके ऊपर पूरी बांह की बनियान अनगिनत छिद्रों से सुशोभित अपने वास्तविक रंग को त्याग करके शायद अपनी पहचान छुपाने का प्रयास कर रही हैं। चेहरे पर पड़ी झुर्रियों के बीच में दो गम्भीर किंतु मायूस आॅंखें अपने किसी खाई में छुपाने का प्रयास करती। साथ ही सिरपर सफेद उलझे हुए बाल, बेतरतीब दाढ़ी उसके उम्र का प्रमाण पत्र बन चुकी हैं।
सरन ने धीरे से कंधे पर रखी कुदाल को नीचे रखकर पुरे खेत पर एक वृत्तिय दृष्टि घुमाई। कुदाल से थोड़ी मिट्टी खोदी और उसे हाथ में लेकर उसके नमी का निरिक्षण ऐसे कर रहा है जैसे कोई वैज्ञानिक किसी टेस्टट्यूब में कुछ रसायन मिलाकर उसके अनुकूल परिणाम पाने की आशा में एकटक निगाहों को परखनली पर गाड़ दिया हो। मिट्टी को हथेली के सहारे मसलकर मायूस नज़रों से देखते हुए धीरे-धीरे मुक्त करता चला जाता है। एक पल आसमान की तरफ देखा फिर एक आशा भरी निगाह खेत के बगल से निकली नाली पर। इस दौरान उसके चेहरे पर कई तरह के भाव उभरे, फिर विलीन हो गये। कह पाना मुश्किल है कि ऐ भाव आशा के थे, निराशा के, या फिर खुशी के हैं।
सरन लचकती हुई कईन की तरह अपने दांये हाथ को घुटने पर रखकर झुकता है और धीरे-धीरे मेड़ पर बैठ जाता है। कुछ पल के लिए चेहरे पर शकून के भाव उभरे। साथ ही मन मस्तिष्क में कल का चित्र भी उभरने लगा-
बड़ी बहू किस प्रकार से उवससे पेश आयी थी जब उसने अपने पोते को घर के अंदर एक और रोटी लाने को भेजा-
”जाकर कह दे रोटी नहीं है। बुड्ढे को बैठे बैठे सिर्फ रोटी मांगने आता है। न काम के न धंधा के। पता नहीं कब मरेगा बुड्ढ़ा।“
सरन का पोता तो एक माध्यम था। वास्तव में यह बात इतनी तेज कही गयी थी कि वह सुन सके। सरन के लिए यह कोई नई बात नहीं थी। वह तो इतनी कड़वी बात सुनने का आदती था। सो उसके ऊपर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा लेकिन फिर भी.................
”ले ! ले जाकर दे दे बुड्ढ़े को और कह देना कि दूसरी रोटी नहीं मिलेगी।“
बच्चा हाथ में रोटी लटकाए हिलाते हुए लेकर आया और सरन को देकर बोला-
“बाबा...बाबा माॅं कह रही है कि.......”
“रहने दो बेटा मैं जान रहा हूॅं।”
सरन ने उसके मुॅंह पर अपने बुढ़े हाथ का रखते हुए कहा। और दूसरे हाथ से रोटी लेकर दाल में जो कि कहने को दाल थी परंतु देखने में कोई पीला पानी जैसा था, में सानकर दांत विहिन मंसूढ़ों से ऐसे घोल रहा था जैसे रसगुल्ले का स्वाद अत्यंत आनन्द मग्न होकर ले रहा हो। खाना खाकर सरन उठा और घर के सामने धान के खलिहान में पुआल के ढ़ेर के सहारे बैठ गया और आॅंख मुॅंद कर धूप सेकने लगा। ऐसे वक्त में उसके स्मृति पटल पर अतीत की यादें उभरने लगी थी।
उसके विवाह के दो साल बाद जब बड़ा लड़का पैदा हुआ था तो कितनी प्रसन्नता हुई थी उसे। पुरे गाॅंव को उसके बरही में भोज दिया था। कथा भी सुना था ठाकुर बाबा की। पहली संतान वह भी लड़का यह तो हर किसी के लिए आनंद दाता होता है। परंतु सरन को तो जैसे दुनिया की सबसे बड़ी खुशी भगवान ने दी थी।
बड़े लाड्प्यार से पती-पत्नी उसका लालन पालन किए, कोई कसर नहीं छोड़ी थी। सरन उसे आस-पास का हर मेला दिखाने ले जाता। मेले से उसके लिए डमरू, गुब्बारा, बांसुरी, खिलौना, गुड़ की जलेबी और न जाने क्या-क्या चीजें खरीद लाता। इसी दौरान उसे दूसरी संतान पैदा हुई। यह भी बेटा था। अब धीरे-धीरे बड़े बेटे का लाड्प्यार कम हो गया। बात-बात पर पहले उसके नाराज हो जाने पर सरन गांव की दूकान से चुसनी खरीद कर लाकर दे देता और दुलार कर उसे मनाता। उसके इसी आदत के कारण उसका नाम नखड़ू रखा था। परंतु अब उसके नाराज होकर लोटने-पेाटने पर सरन बजाय उसे कुछदेने के कभी-कभी पीट भी देता था। इस तरह से पितृ प्रेम धीरे-धीरेेेेेेेेेेेेे बड़े पुत्र से छोटे की तरफ प्रवाहित हो रहा था जो कि समाज की एक सामान्य प्रक्रिया है। क्या यह उचित है?........
समय के साथ नखड़ू तथा छोटा बेटा मंगरू बड़े होते गये। आगे सरन की दो संताने और हुई। तिसरी संतान लड़की थी। जो जन्म के दो दिन बाद मर गयी। कहने वाले तो दबी जुबान में यह भी कहते हैं कि यह बच्ची खुद नहीं मरी थी बल्कि मारी गयी थी। नमक चटा दिया था सरन ने। लड़की जन्म बोझ माना जाता है न शायद इसीलिए। सच्चाई क्या है कौन जाने, अगर सरन ने ऐसा किया तो अच्छा नहीं किया। आज लड़कियां भी किसी क्षेत्र में लड़कों से कम नहीं हैं। चैथी संतान के समय सरन की पत्नी की तबियत कुछ ठीक नहीं थी। दो दिन पहले से ही बिचारी दर्द से कराह रही थी। आर्थिक तंगी के कारण सरन उसे अस्पताल भी नहीं ले जा सका। ऐसे में बाहर आग के पास बैठा सरन सिर को दोनों पैरों के बीच में डाले न जाने किस सोच या इंतजार में बैठा था। सोच किस बात की, लड़का होगा कि लड़की। मगर इंतजार किस बात का, बच्चा पैदा होने का या फिर औरत के मर जाने का। यह तो सरन के मन की बात है सो वही जाने। मगर सुबह होते होते औरत की दर्द भरी कराह शांत हो गयी एक दम से। बच्चा पेट में ही मर गया था और माॅं भी।
सरन अपने दोनों बेटों का लालन-पालन स्वयं माई, बाप बनकर कर रहा था। नखड़ू को स्कूल भेजने लगा, सड़क के किनारे वाले कन्या प्राइमरी पाठशाला में। कहने को तो यह पाठशाला थी परंतु वास्तव में यह आरामशाला थी मुंशी जी की। जो आराम से दोपहर चढ़ने पर आते और बच्चों को श्याम पट पर लिखे वर्णमाला क,ख,ग........को पटरी पर लिखने को कह देते। जो शायद दो महीना पहले लिखा श्याम पट की शोभा बढ़ा रहे थे। किसी बच्चे को, सामान्यतः कक्षा के मानीटर को गिनती पढ़ने को कह खुद स्कूल के पीछे पड़ी नेवार की चारपाई पर गर्मी में ठण्डी हवा और ठण्डी में धूप लेने बैठते और सोते रहते। नींद तब खुलती जब कोई बच्चा शिकायत लेकर जाता कि -
“मुंशीजी-मुंशी जी फला लड़का मेरी दुद्धी चुरा लिया है,या मार दिया है,या फिर कुछ और।“
उॅंघते हुए बजाय उसकी समस्या को सुनने के उसे डांट कर भगा देते और एक जम्हाई लेकर पुनः खर्राटे भरने लगते।
स्कूल जाने का समय जैसे जैसे करीब आता नखड़ू को तमाम बिमारियां तमाम परेशानियां घेरने लगती। कारण कि वह स्कूल जाना नहीं चाहता था। परंतु सरन भी उसके इस आदत से परीचित था। उसके सभी बिमारियों का इलाज जानता था, वह , तभी तो उसके तमाम बहानों के बावजूद उसे उठाकर, बांधकर स्कूल तक ले जाता। धीरे-धीरे नखड़ू स्कूल के लिए जाने लगा परंतु स्कूल नहीं पहूॅंचता था। बल्कि गांव के दक्षिणी छोर पर खड़ा खंडहरों के बीच में एक विशाल मोटी कैथा के पेड़ के पास कैथा तोड़ने पहुॅंच जाता। कहने वाले कहते थे कि इस खंडहर में एक चुड़ैल है जो किसी को अकेले पा जाए तो उसे डरा देती है बिल्कुल बड़े बड़े दांत निकालकर कई तो उसे बिल्कुल दोपहर के समय सफेद कपड़ा पहने टहलते हुए देखा है, कईयों के तो हाथ पकड़कर खींच भी रही थी, परंतु किसी तरह से बचकर वहां से भागे। लेकिन नखड़ू के साथ ऐसा अभी कुछ भी नहीं हुआ था। शाम को जब पाठशाला के छुट्टी को घण्टा सुनता तो पटरी झोला उठाता और घर की तरफ चल देता।
नखड़ू की यही प्रक्रिया चलती रही। कभी जब वह अधिक कैथा और इमली भी पा जाता तो लेकर स्कुल भी जाता और अपने साथ के लड़कों को खिलाता जो कि इसके पक्के मित्र हो गये थे। और कुछ को दुद्धी और स्याही के बदले बेचता भी, अब मंगरू भी स्कूल जाने लगा परन्तु वह भी अपने भाई के ही नक्शे कदम पर चलकर उसकी परम्परा को आगे बढ़ा रहा था।
किसी तरह से दोनों भाई पाॅंचवीं पास किये या यॅूं कहिए कि पास किये गये। इसके बाद अब आगे पढ़ने के लिए पाठशाला छोड़कर उन्हें दूर किसी विद्यालय में जाना था। परन्तु उनमें न तो पढाई के प्रति कोई रूचि थी और न ही सरन उनको पढाने में सक्षम था। अतः दोनों भाइयों ने पढाई छोड़ दी। अब दोनों भाई घर पर ही रहते। थोड़ा बहुत जो घर का काम था उसी में सरन का हाथ बटा लेते। वैसे करने को था ही क्या। दादा परदादा की छोटी सी करीब पाॅंच विस्वा की जमीन का एक टुकड़ा। सरन बताता है कि उसके दादा एक जमींदार के यहां नौकर थे। बड़ी सेवा की थी उन्होंने जमींदार की सो जमींदार ने यह जमीन उन्हे दान में दी थी। कहते हुए सरन अपने आपकेा अत्यंत गौरवान्वित महसूस करता था।
सरन इसी जमीन के टुकड़े केा अपने बाप दादा की अमानत समझकर उसे सीने से लगाकर रखा था। जी तोड़ उसमें परिश्रम करता और उसमें से अधिक से अधिक पैदावार लेने के लिए तमाम जतन करता रहता। उसमें उगने वाले हर पौधे में वह अपने दादा के अक्स को पाता ओैर उससे प्राप्त अनाज को वह अपने पूर्वजों का प्रसाद मानता और जिसका अत्यंत श्रद्धा के साथ वह उपभोग करता था। उसी सछोटी सी जमीन के टुकड़े से इतनी पैदावार हो जाती कि उसके परिवार का खर्चा चल जाता था। पितरों के इसी प्रसाद के कारण सरन उस जमीन से मानसिक रूप से जुड़ गया था। खेत के एक पौधे की क्षति भी उसक लिए असहनीय पीड़ा का कारण बन जाती थी।इस खेत की धूल, अन्न जिसमें खेल खाकर वह और उसके बच्चे बड़े हुए उसकी महक वह हर पल अपने रोम-रोम में महसूस करता। बात पिछले साल की ही है जब उसके खेत की फसल को कोई जानवर नुकसान पहुॅंचा दिया था, खेत पर सरन पहुॅंचा यह देखकर असीमित पीड़ा से कराह उठा था वह, और घण्टों खेत के मेड़ पर बैठकर उदास मन से इन नष्ट हुए पौधों को एकटक निहारता रहा, विशाद इतना कि कई दिन तक खाना नहीं खाया।
समय के साथ सरन की उम्र ढ़लती गयी और बच्चों की उम्र चढ़ती गयी। नखड़ू बड़ा होने के कारण अब अपनी जिम्मेदारियों का कुछ समझने लगा था परंतु मंगरू में अभी लड़कपन का अल्हणपन था। एक दिन नखड़ू बोला-
”बापू हम शहर कमाये के लिए चले जाई का।“
एक बार पैर से पगड़ी तक नखड़ू को सरन ऐसे देखा जैसे कोई माॅं अपने बच्चे को मासूमियत भरी निगाह से देखती है जब वह ऐसे पोखरे में नहाने की जिद करता है जिसकी गहराई का उसे कोई अंदाजा नहीं होता। फिर प्रश्नवाचक भाव चेहरे पर लाते हुए बोला-
“क्यों रे ? तुमका यहाॅं गाॅंव में का चीज कै कमी है। अच्छा भला-चंगा तो है। का बदबू आ रही है ई गाॅंव की माटी से या महक रही है शहर के पक्की सड़कन से। माटी की सोंधी गंध की परख तुमका महसूस नहीं हो रही है नखड़ू? काम की कमी है का हमारे गाॅंव मा, करो तो तमाम काम पटे पड़े हैं। और अभी तो तूं कितना छोटा है। तुं का जाने शहर के बारे में, मूरख बनाय देत हैं देहाती लोगन का ऊ शहर वाले।”
तुं शहर गया है का बापू ? टपाक से नखड़ू पुछ पड़ा।
नहीं रे ! सुना है शहर के बारे में। ऊ का नाम है हरिया के बापू का........
’सरजू ’ तुरन्त उत्सुकता एवं तिव्रता के साथ नखड़ू बोला था।
हाॅं-हाॅं वही। गया था न ऊ शहर। वही ई सब बतावा रहा हमसे।”
“हाॅं बापू ई बात तो सही है कि शहर के लोग बहुत चालाक होत हैं लेकिन हम भी तो पढ़ा लिखा है पाॅंचवी तक। गिनती पहाड़ा सब तो याद है। तेरह को छोड़कर पहाड़ा तो पन्द्रह तक याद है। जाने दो न बापू हमका शहर। कमाकर खूब तुम्हारे लिये पैसा भेजूंगा”
नखड़ू पल हर पल अपनी बात कहता और जैसे ख्वाब में डूबता चला जा रहा था। सरन उसकी बात को नादानी समझकर अनसूना करता गया।
एक दिन काफी अंधेरा हो जाने पर सरन मजदूरी करके लौटा था। मंगरू सामने नीम के पेड़ के नीचे बंधी गाय के बछड़े को दुलरा रहा था। थकावट से चूर सरन बैठते हुए बोला-
”अरे मंगरू का कर रहा है बिटवा, अंधियार होय गवा, बत्ती जलाय दो न अऊर ऊ नखड़ू कहाॅं है।“
“पता नहीं बापू कहीं खेल रहा होगा गुल्ली-डंडा।” मंगरू बड़े ही बेरूखी से बोला।
”अरे ! ई इतना अंधियार होय गवा है अभी ससुरा ऊ गुल्ली डंडा खेल रहा है। आज आये घर तो बताउॅं का होत है गुल्ली-डंडा।“- तनिक जबड़े को सख्त करते हुए गुस्से से बोला था सरन।
तनिक अंधेरा और बढ़ गया चारों तरफ निस्तब्धता छा गयी, झेंगूरों की आवाज में तिव्रता और मानवीय आवाज में शून्यता आती चली गयी। बीच-बीच में झेंगूरों के बेसूरे कर्कश डरावने सुरों के बीच कुत्ते अपने तबला राग को निकालकर अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे थे।
सरन की चिंता बढ़ती जा रही थी-
”अभी तक आवा नहीं कहां जाय सकत है ससुरा। कहीं हरिया के घर अभी तक तो बैठा ना है। अरे मंगरू ! ऊ थोड़ा लालटेन उठाव, चल देख लें कहीं हरिया के घर तो ना बैठा है।“
मंगरू झल्लाते हुए बोला-”का बापू तुमहूॅं परेशान कर रखे हो। तुम जाओ मैं ना जाबों।“
सरन आग्रह पूर्वक कहा-“अरे चल बिटवा, अब का किया जाय, हरिया के घर तो कम से कम देख लिया जाये। ई जाड़ा पाला में ससुरा कहाॅं रही गै। अब तक कभी तो इतने पहर तक कहीं नहीं रूकत रहा। आज मिले ससुरू त उनकर कचूमर बनाइत है।”
इतना कहकर सरन अपनी लाठी उठाकर, मोटा भेंड़ के बाल वाला कम्अल जिसपर चारखाने बने थे को जैसे तैसे अपनी शरीर पर लपेटते हुए घर से निकला। कम्बल का बांया किनारा रहरहकर जमीन को छू लेता। लगता जैसे जमीन को छू-छूकर ठण्डक का अनुमान लगा रहा हो। दांये हाथ में थमी बांस की लाठी निश्चित अंतराल के बाद जमीन ठक-ठक के साथ गिरकर जैसे दुरी नापने का प्रयास कर रही हो। पीछे-पीछे मंगरू रेंगता चला जा रहा था। एक हाथ में लालटेन लटकाए, दूसरे हाथ को सीने में दुबकाए, मुट्ठी बांधे जैसे समस्त ठण्डी को मुट्ठी में बांधकर कह रहा जो कि बस इतनी सी एक मुट्ठी ठण्डक है, परंतु उसके खड़े रोंगटे यह बता रहे हैं कि यह झुठ बोल रहा है,। ठण्डक एक मुट्ठी या दो मुट्ठी नहीं है बल्कि असीमित है यह इन रोंगटों की तरह। बीच-बीच में सरसराती ठण्डी हवा पास से किसी डरावने सपने की तरह गुजरती तो दांत की कटकटाहट रोंगटों की बात का समर्थन करते प्रतीत होते।
सरन आगे लाठी लिए मंगरू पीछे-पीछे लालटेन लिए ठण्डक की कठोर चादर को चिरते हरिया के घर की तरफ बढ़ रहे थे। रास्ते में इन्हें देखकर कुत्ते एकाएक भौंकने लगते फिर धीरे-धीरे पास आकर शांत हो जाते और उनके पैरों को सूंघकर पुॅंछ हिलाने लगते मानो वे अपना आत्मसमर्पण कर दिए हों। सरन लम्बी-लम्बी डग भरता जल्द ही हरिया के घर पहुंच गया। अभी सब खाना खकर अलाव के पास बैठे थे, सोए नहीं थे। हरिया पुआल के बिछौने में घुसा कम्बल ताने लेटा था। पेट पर रेडियो लिए उसमें घुमा घुमाकर कुछ कर रहा था। यह वही रेडियो था जो कि शहर से लाया था उसका बापू सरजू उसके लिए। इस रेडियो की बदौलत गाॅंव मे सभी लड़कों में धाक जम चुकी थी हरिया की।
घर के सामने दो मानव सम आकृतियों को देखकर अलाव के पास से ही हाथ की गरमी को मसलते हुए सरजू बोला-
”अरे ! कौन है भई उधर ? “
”हम हैं सरजू भाई सरन।“ कहते कहते वह अलाव तक पहुंच चुका था।
सरन को इस समय इस ठण्डक में देखकर हैरानी से बोला सरजू-
”अरे सब खैरियत तो है न सरन भाई, का बात है जो तुमका इतनी रात गये आना पड़ा, और ई मंगरूआ के काहे परेशान किया ई ठण्डक मा।“
सरन चेहरे पर परेशानी के भाव लिए बोला-
”इहां नखड़ूआ है का सरजू भाई। अभी तलक घर नहीं पहुॅंचा।“
सरजू के चेहरे पर परेशानी के भाव डूबने उतराने लगे-
”का कह रहे हो सरन ? अभी तक ऊ घर नहीं पहुंचा। आज तो यहां ऊ आया ही नहीं। कहां चल गया?।“
इतनी बात सुनते ही सरन के चेहरे के भाव तेजी से बदलने लगे। मन में तमाम आशंकाएं उठने लगी। उसकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था कि अब क्या करे? इस कड़कड़ाती ठण्डक में अब कहां खोजे उसे।
उदास और हताश भाव से बोला-
”अच्छा सरजू भाई जाईत है। थोड़ा रंजन काका के घर भी पता कर लें, का पता उहीं ससुरा सोय गै होय।“
सरन और मंगरू शरीर व मन से रंजन काका के घर पहुंचे। नखड़ू वहां भी नहीं मिला। थक हार कर दोनों अपने घर आ गये। अब तक मंगरू को काफी ठण्डक लग चुकी थी। उसके कांपते शरीर व कटकटाते दांत ने सरन का ध्यान अपनी तरफ खींचा। सरन एक दारूण दृष्टि उसके ऊपर डाली तो देखा उसके आंखों से टुटते मौन मोतियों की लड़ी हाथ पर गिर-गिरकर टुट रहे थे। उसकी यह दशा देखकर सरन जो कि अंदर ही अंदर जो अपने आंसूओं को पीता चला जा रहा था। बोला-
”अरे बिटवा तुं रोअत काहें हो। नखड़ू आ जाई न, तुम रोओ न। अरे तुम तो कांप रहे हो ठंडक से। ओओ आग जलाय दूॅं।“ कहकर वह आग जलाने लगा।
मंगरू कंपकपाते होठों और ठण्ड से सिकुड़ चुकी जिह्वा को गतिमान किया-
”बापू कहां गया होगा भइया, खोज लाओ बापू भइया को।“ कहते कहते मंगरू हिचकियां लेते हुए रो पड़ा था। उसकी यह दशा देख सरन नहीं रोक पाया अपने आपको। आॅंखों में जैसे आंसूओं की बाढ़ सी आ गयी, जिसे पीने में अब असमर्थ था सरन, सो आंसूओं की पतली मोटी सरितायें फुट पड़ी सरन के चिंतित मटमैली आंखों से। लिपट कर दोनो बाप-बेटे एक दुसरे को आंसुओं से भिगाते रहे, जिसके प्रभाव से बगल में जलती हुई आग जल्द ही बुझ गयी जैसे किसी ने उस पर पानी डाल दिया हो। धुएं का गुबार सा उठने लगा। धुएं की निक्ष्णता आंख की सरिता के वेग को और तिव्र कर रहे थे। सरन मंगरू को उठाकर धीरे से पुआल के बिछौने पर लिटाकर कम्बल ओढ़ा दिया तथा बगल में खुद लेट रहा।
सरन के मन में तमाम विचार आते जाते रहे। विचारों के विप्लव में वह गोते लगा-लगाकर नखड़ू के ही अस्तित्व को तलाश रहा था। न जाने कहां होगा, कैसे होगा इस ठण्डक में। मन के अंदर बवंडरों का जलजला सा उठता फिर शांत हो जाता। हड़कम्प सी मची थी मन मस्तिष्क में परंतु बाहर घेर निरवता अपना साम्राज्य स्थपित करती जा रही थी। सरसराती हड्डियों तक को कंपा देने वाली पुरवाई, झिंगुरों की तारतम्य आवाजें, कुत्तों का भौंकना तथा बीच-बीच में मंगरू की सिसकियां इस निरवता को भंग कर रही थी।
सुबह अलाव के पास बैठा सरन एकटक जलती आग को देख रहा था, हवा के झोंके से सुलगती भूसी एक पल के लिए चमक उठती दूसरे ही पल काली राख में बदल जाती। उसमें से उठता धुंआ कभी सीधे ऊपर तो कभी पूरब, पश्चिम तो कभी दक्षिण मनमौजी दुःख की तरह चल पड़ता। उसमें खोदकर मंगरू छोटे-छोटे आलुओं को डालकर ढ़क देता तो कभी निकालकर उन्हें दबाकर उनपके पकने का अनुमान लगाता तो कभी संठे के एक छोर को जलाकर दुसरे छोर मुंह लगाकर बीड़ी जैसे पीने का आनन्द उठाता। सरन इन सब घटनाओं को एकटक किसी दार्शनिक की तरह देख रहा था। चेहरा इतना गंभीर जैसे वह अनंत ज्ञान की गहराई में पहुंचकर प्रकृति के किसी गूढ़ रहस्य को सुलझाने का प्रयास कर रहा था। अपलक दृष्टि, स्पंदनहीन चेहरा, चेहरे का भाव क्रमशः गाढ़ा, हल्का, धुंधला फिर चमकदार होता हुआ जैसे पा लिया हो कोई सागर का मोती, प्रकृति का वह गूढ़ रहस्य, चेहरा गंभीर से गंभीरतम से क्रमशः गंभीरतर होता हुआ। तभी हरिया की आवाज ने सरन को जैसे यथार्थ के धरातल पर ला पटका।
”सरन चाचा.............सरन चाचा।”
“हां...............कौन? अरे हरिया तुं !” सरन जैसे नींद से जागकर बोला हो।
हरिया बोला-
”चाचा कल रात आप नखड़ू को खोज रहे थे न, वही बताउब के खातिन हम आवा है।”
सरन अत्यंत ब्यग्रता से पूछा-
”कहां है हमार नखड़ू, जल्दी जल्दी बताव बिटवा।”
पास बैठा मंगरू भी अवाक सा मुॅंह खोले, हरिया की बात सुनने को चैतन्य हो गया।
हरिया बोला-
”ऊ का है न चाचा नखड़ू तो शहर गया। ई खबर हमका आज सुबह दीनू से मिली । ऊ शहर से आज आवा है न उसी से नखड़ू स्टेशन पर मिला रहा। कहत रहा कि बापू से कह देना कि हम शहर जा रहा हूॅं। हमरे लिए परेशान न होना।“
इतनी बात सुनकर मंगरू व सरन एक दूसरे को निहारने लगे। आॅंखों से ही मूक संवाद होने लगा। कंपकपाते होंठ व आंखों की नमी को जलती भूसी कम न कर सकी। सरन को लगा जैसे उसका कोई तोता उछ़ गचया हो जिसमें उसके प्राण बसा करते हों। मंगरू कुछ समझ नहीं पा रहा था कि क्या करे वह। उसक घोंसले का उसके दुख-सुख का साथी उसका भाई उसके घोंसले से उड़कर किसी और घोंसले में अपना ठौर खोजने निकल पड़ा है। न जाने कहां किस हाल में होगा वह। अब कौन उसे कैथा व इमली लाकर देगा। काौन उसे गुल्ली डंडा खेलायेगा। लाख गलतियां होने पर भी इसी का पक्ष लेने वाला इसका भाई कब लौटेगा? कौन बताए इसे.......।
वक्त अपनी उसी रफ्तार से आगे बढ़ता रहा बिना पीछे देखे और बीना आगे की सोचे। कभी दांए करवट से तो कभी बांए करवट। मंगरू ने तरूणाई का आलिंगन किया तो सरन ने बुढ़पे को स्पर्श किया। मंगरू की शादी हो गयी, बहू घर आई तो घर में जैसे खुशियों का साम्राज्य छा गया। सरन तो जैसे दुख की परिभाषा ही भूल गया। परंतु रह-रहकर नखड़ू की याद सताती रही। ये यादें मन में टीस की तरह उठती जो उसे अतीत में खींचने का प्रयास करते परंतु सरन का वर्तमान अधिक शक्तिशाली साबित हो रहा था।
सरन अब मजदूरी पर जाना बंद कर दिया। मंगरू ही मजदूरी करता, उसी से घर का खर्च चलता। बहू बड़े ही मन से सरन की सेवा करती। एक आदर्श गृहणी के सारे गुण मौजूद थे उसमें। घर का तो जैसे काया कल्प ही हो गया था। सरन ने तो कभी आशा भी न की थी कि उसके दिन इस तरह से खुशगवार हो जायेंगे। यह क्रम अभी टुटा नहीं था, मंगरू को बेटा पैदा हुआ तो सरन को नखड़ू की याद आ गयी। वैसा ही कथा भोज जैसा नखड़ू के पैदा होने पर सरन ने किया था, मंगरू ने किया। सरन का घर खुशियों से पटता जा रहा था। बच्चे की किलकारी ने पुरे घर के कोने-कोने को भर दिया। इसी बीच वह दिन कैसे भूल सकता है सरन, जब एक नौजवान एक हाथ में बैग दूसरे में सुटकेश, एक बैग पीठ पर लादे घर के सामने आकर रूका। हौले से बैग रखकर लगभग दौड़ते हुए दरवाजे पर बैठे सरन का पांव छुते हुए बोला-
“पांव लागूं बापू !”
धुंधले आंखों से मुंह ऊपर करके देखते हुए सरन बोला-
“भगवान कुशल रखे बिटवा। लेकिन हम तुमका पहचाना नहीं बिटवा।”
”अरे बापू मुझे नहीं पहचाना, अरे मैं तुम्हारा नखड़ू।“
”मेराऽऽ .........नखड़ू..........।“
”हाॅं बापू हाॅं ................मैं तुम्हारा नखड़ू हूं।“
”अरे................तुम तो एकदम बदल गै हो। पहचानै में ना आवत हो। कहाॅं अब तलक थे? कईसे कउन हालत में थे। कभी कुछ खबर भी नै दिए।“
कहते कहते सरन की बुढ़ी आॅंखों में बुढ़े आंसुओं की सफेद चादर तन गयी। गला जैसे रूॅंध सा गया। जिह्वा तो जैसे उच्चारण करना ही भूल गयी सिर्फ हाथों के इशारों से उसे पास बैैठने का इशारा करके एकटक निहारता रहा एक दम मौन।
नखड़ू के घर आने से तो सरन के घर रोज उत्सव जैसा माहौल रहता। नखड़ू से लोग मिलने आते और शहर के बारे में तरह-तरह की बातें पूछते। नखड़ू भी उन्हें बड़े चाव से महिमा मण्डित करके बताता। अपने बारे में तरह-तरह की बातें बताताकि कैसे वह शहरगया और किन-किन मुसीबतों का सामना करते हुए शहर में काम पाया था। फिर जी तोड़ मेहनत करके वह कैसे पैसा इकट्ठा करता रहा। और यह भी बताया कि शहर में पैसा कमाना इतना आसान नहीं है जैसा कि गांव वाले सोचते हैं। बड़े पापड़ बेचलने पड़ते हैं तब कहीं जाकर काम मिल पाता है।
सरन ने अब नखड़ू की भी शादी कर दी। बड़ी बहू घर आयी। मंगरू के विवाह की रौनक और पोते के पैदा होने की खुशी अभी कम भी नहीं हुई थी कि फिर से वही विवाह की रौनक वही चहल-पहल घर बाहर छा गयी। शायद सरन के लिए यह अंतिम बार था। क्योंकि बड़ी बहू का मिजाज छोटी के बिल्कुल विपरीत था। जल्द ही घर के खुशियों भरे माहौल को जैसे तनाव का दीमक लग गया। बड़ी बहू को यह बात खटकती थी कि उसका पति शहर से कमा कर लाया है जिसका उपभोग घर के अन्य लोग भी करते हैं जबकि उस पर तो सिर्फ उसका ही अधिकार है। उसे यह बात कतई बर्दाश्त नहीं थी कि उसके पति की कमाई में उसकी देवरानी भी शरीक हो। इन्हीं सब बातों का लेकर बार-बा रवह झगड़ा करती परंतु छोटी बहू अपने शीलता और सदाचार से हमेशा उसे पराजित करती। इसके इसी शीलता का परिणाम था कि सरन व खुद नखड़ू भी उसका पक्ष लेते। जो कि बड़ी बहू के डाह में द्विगुणित बृद्धि कर देता। नखड़ू कई बार उसे समझाया। कभी-कभी तो उसे मार पीट भी देता परन्तु उसके ब्यवहार पर इसका कोई असर नहीं था। आखिरकार उसके पुरे घर को तनाव के दीमक खोखला बनाते चले जा रहे थे।
अंततः नखड़ू को अपने पत्नी के सम्मुख हथियार डालना पड़ा। बात बंटवारे तक आ गयी। आखिर सरन को उम्र के अंतिम पड़ाव पर अपने छोटे से घर में जिसके बारे में कितने लौकिक व अलौकिक सपने देखे थे, एक नई तीसरी दीवार भी बनते देखी। घर का बंटवारा हो गया। जमीन थोड़ी सी थी। सरन से साफ तौर पर कह दिया कि मैं जीते जी इस जमीन को बंटने नहीं दूंगा। आखिर यह हमारे दादा-परदादा की निशानी है। मैं जब तक जिंदा हुॅं खेती करूंगा। परंतु मामला यहाॅं आकर फंसा कि सरन किसके साथ रहे। मंगरू के या नखड़ू के।
छोटी बहू तो कह रही थी कि बाबू जी आप हमारे साथ रहें। सरन भी यही चाहता ाथा। परंतु बड़ी बहू इस पर राजी नहीं हुई। वैसे तो वह चाहती थी कि वो हमारे साथ न रहे। परंतु यह सोचकर कि ये जिधर जायेंगे जमीन की उपज उसकी होगी और साथ ही साथ अगर बुड्ढा दो रोटी खायेगा तो क्या घर का अन्य काम तो करेगा। छोटी बहू तो यहाॅं तक कह रही थी कि बाबूजी आप हमारे साथ ही रहिये हमको जमीन-वमीन का कोई मोह नहीं। बस मोह है तो आपके स्नेह की । आप जमीन उन्हीं को दे दीजिए। परंतु इसपर भी बड़ी बहू राजी नहीं हुई। अंततः निर्धारित हुआ कि सरन छः महीने छोटी बहु के साथ और छः महीने बड़ी बहू के साथ रहेगा।
तब से सरन कभी इस पलड़े में तो कभी उस पलड़े में होता हुआ अपने जीवन यात्रा पर अग्रसर हो रहा था। अपने इस जीवन यात्रा में वह छोटी बहू को छांव तो बड़ी को धूप मान रहा था। छः महीने धूप के बाद छः महीने तक छांव में यात्रा करनी पड़ती थी। समय यहाॅं अपने ही गति से चल रहा था। परंतु सरन को समय की इस गति में असमानता नजर आती। लगता समय कभी-कभी रूक सा गया है और कभी-कभी समय को जैसे पंख लग गया हो, इधर आया और उधर समाप्त। जब सरन मंगरू के साथ होता तो उसे लगता जैसे समय उड़ता चला जा रहा है। और यही वक्त जब नखड़ू के साथ बिताने होते तो लगता जैसे समय के पंख ही भीग गये हैं।
जब तक नखड़ू था तब तक तो सरन को कुछ सहूलियत थी। परंतु जब से नखड़ू शहर गया तब से तो सरन के लिए बड़ी बहू के साथ एक-एक पल रहना भारी पड़ रहा था। नखड़ू का एक लड़का था उसी के साथ सरन कुछ पल के लिए सहज महसूस करता परंतु यह स्थिति भी कुछज्यादा देर तक न रहती , कारण की बड़ी बहू बच्चो को सरन के पास रहने ही नहीं देती और सरन को कोई न कोई काम ओढ़ा देती जिसे सरन अपनी बुढ़ी हड्डियों के सहारे ढोता रहता। इस तरह सरन जीवन के खट्टे-मीठे अनुभवों को अपने स्मृति पटल पर छापता रहा।
परन्तु आज जो बहू के मुख से शब्द निकले न जाने क्यों उसके स्मृति पटल पर एक चोटिल निशान छोड़ गये। जिसके चोट से निकले रक्त से उसकी पुरी स्मृति रक्त वर्ण में बदलकर स्याह होती जा रही थी। सोच रहा था, क्या आदमी इसीलिए अपनी संतानों को इतने लाड्प्यार से पालता है कि एक दिन.............
तभी उसके इस विचार प्रवाह को भंग करती हुई एक मीठी आवाज उसके कान में दस्तक दी-
”बाबा.....बाबा.....कहां हो बाबा।“ तोतली आवाज में उसका पोता बोलता हुआ आकर उसकी गोंद में बैठ गया। और उसकी ठोड़ी को उठाकर अपने पाजामे के नाड़े के पास से रोटी का एक टुकड़ा निकालते हुए बोला-
”बाबा ! ये लो लोटी खाय लेओ। अउल अम्मा केा नै बताना। नही ंतो ऊ हमका मालेगी।“
बच्चे की इस तोतली अमृतमयी वाणी ने सरन के सूखते प्राणों में जैसे नव प्राण सा छाल दिया हो । उसके आॅंखों से निर्विकार स्नेहमयी अश्रूधारा फूट पड़ी। सिने से चिपकाए काफी देर तक सरन बच्चे की पीठ सहलाता रहा। मरहम पट्टी की तरह सीने से चिपका उसका पोता जैसे उसके दिल के सारे घावों को भरता चला जा रहाथा। सरन अपने अंदर एक नई स्फूर्ति और खुशी का अनुभव कर रहाथाज्ञ। झट उठा पोते को कंधे पर उठाया और लम्बी डग भरते गांव की एक दुकान पर पहुॅंचा और वहां से छोटी-छोटी रंगीन मीठी गोलियां खरीद कर पोते को दिया। मीठी रंगीन गोलियां पाकर बच्चा अत्यंत खुश हुआ। पुनः बच्चे को कंधे पर बैठाकर सरन घर की तरफ वापस चल दिया। कंधे पर बैठा बच्चा एक मीठी गोली अपने मुख में डालता तो एक कमीठी गोली सरन के मुख में डालता। सरन मना करता परंतु जिद करके उसका मुख खुलवाता और धीरे से एक मीठी गोली उसके मुख में डाल देता।
सचमुच कितनी यथार्थ शिक्षा छुपी थी बच्चे के इस आचरण में। काश बड़े भी बच्चों के इन आचरणों से कुछ शिक्षा ले सकते। ढाल सकते ऐसे आचरणों को अपने जीवन में तो समाज आज क्या से क्या हो जाता। हमारे बुजूर्ग जिनके हम अंश हैं । जिनके सामने हम एक बच्चे ही तो हैं फिर उनके सम्मुख हम बच्चे सा आचरण क्यों नहीं करते ? क्यों करते हैं हम उनके साथ बड़ों सा आचरण? ये हमारे बुजूर्ग जो कुछ ही दिनों तक हमारे साथ रहेंगे तो क्यों नहीं ढ़ाल लेते हम अपने आचरण को उनके अनुकूल? शिवाय इसके हम यह आशा करते हैं कि ये बुजूर्ग जो अब कि जिस परम्परा, आचरण पर चलते आ रहे हैं वे अपने आचरण को हमारे अनूकुल बदल लेंगे कैसे सम्भव है यह ? जो आप युवा होकर नहीं कर सकते तो वे यह परिवर्तन बृद्ध व कमजोर होकर कैसे कर सकते हैं।
सरन कदम कदम घर की तरफ बढ़ रहा था। बच्चा क्रमशः एक मीठी गोली अपने मॅंुह में एक सरन के मुंह में डाले जा रहा था। सरन को ऐसा लग रहा था जैसे हर मीठी गोली के साथ अपने जीवन के विभिन्न पड़ावों को जीता चला जा रहा हो। घर पहुंचते-पहुंचते मीठी गोलियां खत्म। सरन फिर उसी ठहराव पर आ गया। वही बुढ़ापा, वही घर, घर के बीच आंगन में एक दीवार सरन के लिए दीवार के एक तरफ सुख की छांव तो दुसरी तरफ दुख के धूप थे। परंतु सरन को आज इस धूप में भी कुछ छाया का एहसास हुआ था। यह छाया बनकर उसके कंधे पर था उसका पोता। अब सरन बड़ी बहू के हर बाता को अनसूना करके बिल्कुल एक सिरे से नई स्फूर्ति के ससाथ फिर से जीने की तमन्ना ठान लिया था। कम से कम अपने पोते के वास्ते।
शाम हुई अंधेरा हुआ और फिर वही कड़ाके की ठण्डी रात सब अपनी निरंतरता बनाए प्रकृति के नियमों का पालन करते हुए निरंतर अग्रसर ऐसे में भला ऊषा देवी कैसे तोड़ सकती हैं प्रकृति के इन नियमों को। सरन उठा धीरे से अपनी कुदाल कंधे पर रख खेत की तरफ चल पड़ा एक बार फिर से जीवन को तलाशने।
सच यही धरती ही तो है जीवन का श्रोत, जीवन की आशा, ऐसे ही और भी बहुत कुछ जो बीज के अंकुरण के साथ प्रकट होता है। यही अलौकिक और लौकिक सत्य है।
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