अद्भुत ब्रह्माण्ड
(मनोज)
जीवों के उत्पत्ति के विकास क्रम में जब प्रज्ञमानव का आर्विभाव हुआ तो इस प्रज्ञमानव में अपने आस-पास के धरातल एवं अन्य प्राकृतिक वस्तुओं के बारे में जानने की जिज्ञासा उत्पन्न हुई। जैसे-जैसे मनुष्य ने सभ्यता की ओर कदम बढाया उसके अंदर तमाम कौतूहल उत्पन्न होते गये। उसके अंदर सृष्टि के रहस्यों को जानने की जिज्ञासा और प्रबल होती गयी। इस प्रबल जिज्ञासा का परिणाम यह हुआ कि मनुष्य ने तमाम कहावतों को झुठलाते हुए अनेक रहस्यों का पर्दाफास किया।
21जुलाई सन 1969 का वह दिन जब पृथ्वी से 3,84,000 किमी. दूर स्थित किसी अनजान जगह पर एक यान उतरा उसमें से दो व्यक्ति एक अजीब प्रकार की पोषाक पहने हुए निकले। अगला ब्यक्ति अगल-बगल का सूक्ष्म निरीक्षण करने के बाद धीरे सेे अपने पैरों को उस विरान जगह पर स्थिर कर दिया। इस ब्यक्ति के पैर के आस-पास धीरे से धूल कण उड़ी, षायद ये धूलकण उस ब्यक्ति के सभ्यता के यषगाान कर रहे थे। और अपने रहस्य को ख्ुाद ब खुद बयान कर रहे थे। आखिर यह ब्यक्ति कौन था और कहाॅं से आया था? और कैसे आया था? यह तमाम प्रष्न हमारे मन में कौंध से जाते हैं। आइये जाने यह ब्यक्ति कौन था? कहाॅंसे आया था? आप को यह जानकर खुषी होगी कि वह ब्यक्ति कोई और नहीं बल्कि मनु पु़त्र मानव ही तो था। जिसका नाम था नील-आर्मस्ट्रांग और उसके साथी का नाम एडविन एल्ड्रिन था। और जिस सवारी से वे आये थे उसका नाम था ईगल। अब प्रष्न बनता है कि वे कहाॅं गये थे? तो भारतीय परिदृष्य में इसका जवाब इस प्रकार देना मेरे समझ में जरा भी अनुचित नहीं है, कि वे ननिहाल गये थे। क्योंकि जहां वे गये थे उसका नाम चंद्रमा है, चूंकि चंद्रमा को हम मामा और पृथ्वी को माता कहते हैं। खैर छोडि़ये इन बातों को हम अपने मुख्य पहलू पर आते हैं। नील-आर्मस्ट्रांग और एडविन एल्ड्रिन एक अभियान के तहत चंद्रमा पर गये थे। चन्द्रमा पर मानव के पहॅंूचने के बाद तमाम रहस्यों का पर्दा फास हुआ और मानव की यह चन्द्रविजय मानवीय सभ्यता के लिए एक अभूतपूर्व उपलब्धि थी।
पृथ्वी वासियों के वैज्ञानिक उपलब्धियांे को देखकर ऐसा कहा जा रहा है कि ईष्वर ने सबसे ज्यादा बुद्धिमान प्ृथ्वी पर रहने वाले मानव को बनाया है, परंतु एक विचारधारा के अनुसार इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि मानव सभ्यता से भी विकसित कोई सभ्यता अवष्य है जिसकी तुलना में हमारी वैज्ञानिक प्रगति नगण्य है। हम उड़नतष्तरियों के अस्तित्व को कत्तई इंकार नहीं कर सकते। ऐसा माना जा रहा है कि ये उड़नतष्तरियां अन्य ग्रहों से भेजी जाने वाले खोजी यानें हैं। कुछ ब्यक्ति तो दावा करते हैं कि इन उड़नतष्तरियों पर वे मानव सदृष्य जीवों को देखें हैं। वे उनके हुलिया को भी बताते हैं। परंतु यह मानकर चलना चाहिये कि मानविय सभ्यता के विकास का यह क्रम अपनी प्रारम्भिक अवस्था में है, और भविष्य में आषा की जा सकती है कि मानव अन्य ग्रहों पर भी विजय प्राप्त करेगा और उड़नतष्तरी जैसे अनगिनत रहस्यों का पर्दाफास करेगा।
इससे पहले कि मैं सौरमंडल की उत्पत्ति के सम्बंध में आपको बताऊॅं, हमें यह जानना होगा की आखिर यह सौरमंडल या सौरपरिवार आया कहाॅं से? क्या है इसका इतिहास? यह सब जानने के लिए आवष्यक है कि हम कुछ पारिभाषिक शब्दों को जान लें क्योंकि आगे के विष्लेषण यात्रा में हमें इन्हीं शब्दों से रूबरू होना होगा।
वैज्ञानिक भाषा में हम आकाष को अंतरिक्ष कहते हैं। दुसरे शब्दों में जब हम पृथ्वी के वायुमंडल से जैसे ही बाहर निकलते है, हम अंतरिक्ष में प्रवेष करते है। आकाष में दिखाई देने वाले समस्त तारागण ठोस, द्रव तथा गैसीय पदार्थों से बने हुए गोलाकार पिण्ड है, इन्हें हम आकाषीय पिण्ड कहते है। ऐसा माना जाता है कि ये सम्पूर्ण पिण्ड मूलतः एक जैसे हैं, परंतु कई बातों में इनमें काफी अंतर है। आप लोक शायद इस बात से अवगत होंगे कि जो पिण्ड पृथ्वी के निकट स्थित है वे छोटे होते हुए भी बड़े दिखाई पड़ते है, और जो पिण्ड पृथ्वी से दूर हैं वे बड़े होते हुए भी छोटे दिखाई देते हैं। प्रत्येक पिण्ड में गति पायी जाती है। जिससे उसमें गुरूत्वाकर्षण शक्ति उत्पन्न होती है, और प्रत्येक वस्तु को अपनी तरफ आकर्षित करती है। वस्तुतः हमारा अंतरिक्ष कितना विषाल है इसकी केवल कल्पना ही की जा सकती है।
सौरमण्डल
तारों के चारों तरफ चक्कर लगाने वाले ग्रहों, उपग्रहों, क्षुद्रग्रहों तथा अन्य आकाषीय चट्टानों के समूह को सौरमण्डल कहते हंै। इस प्रकार प्रत्येक तारे का अपना सौरपरिवार होता है। और ये सौरमण्डल अनंत आकाष के केन्द्र के चारों तरफ एक निष्चित नियम के अधीन गति करते है।
तारा
ऐसे आकाषिय पिण्ड जो स्वयं के प्रकाष से प्रकाषित होते हैं उसे तारा कहते हैं। हमारे सौरमण्डल का तारा सुर्य है। इन तारों से उत्पन्न ग्रह इन्हीं तारों की परिक्रमा करते हैें।
ग्रह
ग्रह को अंग्रेजी में प्लानेट कहते हैं। प्लानेट का अर्थ होता है घुमना या चक्कर लगाना। अतः ग्रह वे आकाषीय पिण्ड है है। जो तारों के प्रकाष से प्रकाषित होते हैं, और एक निष्चित पथ पर तारों का चक्कर लगाते हैं। बुध, शुक्र, पृथ्वी ......इत्यादि, हमारे सौरमण्डल के ग्रह हैं।
उपग्रह
ऐसे आकाषीय पिण्ड जो ग्रहों का चक्कर लगाते है, उन्हें उपग्रह कहते हैं। चन्द्रमा हमारी पृथ्वी का एक उपग्रह है। वर्तमान समय में वैज्ञानिक ज्ञान के विकास के फलस्वरूप मानव अपने बहुआयामी कार्यों की पूर्ति के लिए कृत्रिम उपग्रहों को पृथ्वी की कक्षा में स्थापित कर रहा है, जैसे- इनसेट श्रेणी के उपग्रह जो कि भारत ने अपने विभिन्न उद्देष्यों को पूरा करने के लिए भेजा है और आगे भी यह क्रम जारी है।
तारामण्डल
सौरमण्डल के अतिरिक्त दो-दो, चार-चार व इससे भी अधिक तारों का समूह होता है जिसे तारा मण्डल कहते हैं। सात ताराओं का समूह जिसे हम सप्तऋषि तारामण्डल कहते हैं, इसका एक अच्छा उदाहरण है।
ब्रमाण्ड
तारामण्डलों के अतिरिक्त बड़े-बड़े तारक पुंज होते हैं इन तारक पुंजों को निहारिका या ब्रमाण्ड कहते हैं। हमारी पृथ्वी अथवा यह सौरमण्डल जिस निहारिका के अंतर्गत आता हैं उसे आकाषगंगा कहते हैं, अनुमान हैं कि हमारी आकाषगंगा में तीन खरब तारे विद्यमान हैं।
सूर्य एक साधारण तारे की भांति आकाषगंगा की एक भुजा पर स्थित है। विद्वानों का मत हैं कि इस सृष्टि में कोई स्थिर नहीं है। सूर्य जिसे हम स्थिर मानते हैं स्वयं आकाषगंगा के केन्द्र के चारों ओर 25 करोड़ वर्ष में एक परिक्रमा पुरी करता है। समूची आकाषगंगा स्वयं अपने केन्द्र पर घूमती है। और पचास करेाड़ वर्ष में एक परिक्रमा पुरी करता है। अंतरिक्ष में निहारिकाएं द्वीपों की भांति फैली हुई हैं इसी कारण इन्हें विष्व द्वीप कहा जाता है। निहारिकाओं में से कुछ निर्माणाधीन होती हैं और कुछ निहारिकाएं पूर्ण होती हैं। इनमें तारे ,ग्रह, उपग्रह आदि बन चुके होते है। हमारी आकाषगंगा एक पूर्ण निहारिका है। निहारिकाओं के निर्माण से इस अंतरिक्ष का उसी प्रकार विस्तार हो रहा है जिस प्रकार से हवा भरने पर एक गुब्बारे का होता है। इसी कारण ब्रम्हांड को वर्धिष्णु कहा जाता है।
प्रिय पाठकों, अब हम जानेंगे कि यह हमारा अद्भूत ब्रम्हाण्ड आखिर बना कैसे? क्या है इसका इतिहास? वैसे तो ब्रम्हाण्ड की रचना प्रक्रिया कई वैज्ञानिक सिद्धांतों पर आधारित है, फिर भी आषा करता हूॅं कि आपके लिए ब्रम्हाण्ड रचना की यात्रा अत्यंत ही रोमांचक एवं आनंदपूर्ण होगी, तो आइये हम चलते है अतीत के उस झरोखे में जहां से हमें ब्रम्हाण्ड रचना की प्रक्रिया अत्यंत ही जीवंत रूप में दिखाई पड़ती है....................
आज से लगभग 15 बिलियन वर्ष पूर्व ब्रम्हाण्ड में उपस्थित छोटे-छोटे पिण्ड इधर उधर बिखरे पड़े थे। ये सभी पिण्ड गुरूत्वाकर्षण बल के कारण ब्रम्हाण्ड के केन्द्र की ओर आकर्षित होने लगे। ये सभी पिण्ड (अणु, परमाणु इत्यादि) एक ही बिन्दु पर एकत्रित होने लगे फलस्वरूप इन कणों के आपस में टकराने से कणों में घूर्णन गति उत्पन्न तथा घूर्णन बल के उत्पत्ति के कारण उष्मा विकसित होने लगी। छोटे-छोटे कण आपस में संयोजित होकर बड़े कणों में परिवर्तित होने लगे। यह नाभिकीय संलयन की प्रक्रिया थी, जिसके कारण ब्रम्हाण्ड में स्थित समस्त पदार्थ ब्रम्हाण्ड के केन्द्र में केंद्रित हो गया। नाभिकीय संलयन की प्रक्रिया निरंतर चलनें के कारण केंद्रित पदार्थ में अत्यधिक उष्मा विद्यमान हो गयी जिसके परिणामस्वरूप एक विषाल विस्फोट हुआ, जिसे बिग बैंग कहा गया। वास्तव में ये नाभिकीय विखण्डन की प्रक्रिया थी जिसकके कारण ब्रम्हाण्ड का केन्द्रित पदार्थ विखण्डित होकर ब्रम्हाण्ड के केन्द्र के चारों ओर फैलने लगा। विखण्डित होने वाले पदार्र्थोें में आज भी नाभिकीय संलयन की प्रक्रिया चल रही है। फलस्वरूप इन पिण्डों में आज भी उष्मा तथा प्रकाष के रूप में ऊर्जा विद्यमान है इसीलिए इन विखण्डित पदार्थों को तारा कहा जाता है। इस प्रकार के असंख्य तारों के निर्मित होने से ब्रम्हाण्ड की उत्पत्ति हुई। जार्ज लेमेटरे के अनुसार वर्तमान समय में हमारा ब्रम्हाण्ड विस्तार कर रहा है। इस कथन की पुष्टि 1970 के दषक में अमेरिकी वैज्ञानिकों ने भी की। जिनके अनुसार ब्रम्हाण्ड में उपस्थित तारों की कक्षा में निरन्तर विस्तार हो रहा है। जिसके कारण ये समस्त पदार्थ ब्रम्हाण्ड के केन्द्र से दूर होते जा रहे हैं, अर्थात ब्रम्हाण्ड का विस्तार ठीक उसी प्रकार से हो रहा है जिस प्रकार से गुब्बारे में हवा भरने पर उस गुब्बारे के आकार में विस्तार होता है। वैज्ञानिकों ने यह भी माना है कि भविष्य में एक ऐसी स्थिति अवष्य आयेगी जब ब्रम्हाण्ड में उपस्थित ये समस्त पदार्थ ध्वस्त होकर एक ही बिन्दु अर्थात ब्रम्हाण्ड के केन्द्र में समाहित हो जायेंगे। इस प्रक्रिया को वैज्ञानिकों ने बिग-क्रंच का नाम दिया है। बिग-क्रंच के बाद केंद्रित पदार्थ में पुनः विखण्डन होगा अर्थात बिग बैंग होगा। वैज्ञानिक ऐसा मानते हैं कि यह चक्रिय प्रक्रिया है, जिसके कारण बिग-बैंग के बाद बिग-क्रंच तथा बिग-क्रंच के बाद बिग-बैंग पुनः होता रहेगा। यही सत्य भी है, क्योंकि विनाष के बाद सृजन तथा सृजन के बाद विनाष ही प्रकृति का नियम है।
प्रिय पाठकों अब तक मैने आपके मस्तिषक में ब्रम्हाण्ड के निर्माण की प्रक्रिया का चित्र खींचा और अब आगे इसी प्रक्रिया को बढ़ाते हुए मैं आपको अपने सौरमण्डल की सैर पर ले चलता हूॅं, जहां हम विभिन्न ग्रहों की सैर करेंगे। इससे पहले कि हम इस अनजाने व रोमांचक सफर पर निकलें हम यह जान लें कि इसका इतिहास क्या है?
बात बड़ी सामान्य सी है कि जिस प्रकार बिगबैंग की घटना हुई और ब्रम्हाण्ड का निर्माण हुआ उसी प्रक्रिया के दौरान उन्ही पदार्थों के सूक्ष्म भाग के संग्रहीत होने से हमारी आकाष गंगा का निर्माण हुआ, और उसी आकाष गंगा के रंचमात्र पदार्थ से हमारे सूर्य की रचना हुई और इसी सुर्य से ही निकलकर विभिन्न ग्रहों की रचना हुई। इन्हीं ग्रहों से निकले पदार्थों से ही उपग्रहों की रचना हुई। और कुछ ऐसे पदार्थ जो कि न तो किसी ग्रह का रूप ले पाये और न ही किसी उपग्रह का रूप ले पाये वे आज भी सुर्य के चारों तरफ ग्रहों की भांति चक्कर लगा रहे है ये क्षुद्र ग्रह की श्रेणी में आते हैं। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि ये क्षुद्र ग्रह अभी ग्रह बनने की प्रक्रिया में चल रहें है भविष्य में ये भी किसी ग्रह का रूप ले सकते हैं। उपरवर्णित समस्त आकाषीय पिण्डों अर्थात ग्रहों उपग्रहों तथा क्षुद्रग्रहों इत्यादि से ही सौरमण्डल की रचना हुई है। तो ये था हमारे सौरमण्डल का संक्षिप्त इतिहास। मैं समझ रहा हूॅं कि अब तक आप लोग सौरमण्डल के सैर के लिए अपनी पुरी तैयारी भी कर लिये होंगे। तो आइये हम चलते है सौरमण्डल के एक रोमांचक यात्रा पर.............
अब हम अपने सौरमण्डल में हैं। इससे पहले कि हम यहां किसी सदस्य के घर चलें आइये सबसे पहले इस परिवार के मुखिया अर्थात सूर्य से मिल लेते हैं। ये हैं सूर्य जो हमारे सौरमण्डल के मुखिया, जनक, केन्द्र, ऊर्जा श्रोत एवं जीवन-श्रोत हैं। ये एक मध्यम आयु तथा मध्यम भार के तारा हैं। ये इस समय पूर्ण संतुलन की दषा में हैं, अर्थात यह न तो फैल रहा है न ही सिकुड़ रहा है। इनके गुरूत्वाकषर्ण बल तथा केन्द्र में नाभिकीय दाह से उत्पन्न वाह्य या केन्द्रापसारी बल के मध्य पूर्ण संतुलन स्थापित है जिसके फलस्वरूप इनके पड़ोस में जीवन सम्भव है। इस दृष्टि से हम पृथ्वीवासी भाग्यषाली हैं। यदि सुर्य छोटा होता तो इसके केन्द्र में नाभिकीय दाह न होता जिससे पृथ्वी पर सदैव सांध्य प्रकाष;जूपसपहीजद्ध तथा पाला;तिवेजद्धकी स्थिति बनी रहती। इसके विपरीत यदि सूर्य वर्तमान की अपेक्षा अधिक बड़े आकार का होता तो इसके तीव्र दाह से ग्रहों पर जीवन सम्भव न होता। पृथ्वी पर मिलने वाले 60 से अधिक तत्व सौर स्पेक्ट्रम में मिलते हैं। सूर्य के भार का लगभग तीन-चैथाई भार हाइड्रोजन का है तथा सूर्य की संरचना का 98 प्रतिषत हाइड्रोजन तथा हीलियम का बना है।
सूर्य के मध्यभाग अर्थात प्रकाषमण्डल के ऊपर उसका वर्णमण्डल रहता है, जहां अत्यंत तप्त गैसों की प्रचण्ड आंधी उठा करती है। जो अधिकतर पूर्ण सूर्यग्रहण पर दिखाई देती है। उसी समय उसकी माप भी ली जा सकती है। यही कारण है कि विष्व के तमाम खगोलविदों को पूर्ण सूर्यग्रहण का बड़ी बेसब्री से इंतजार रहता है। सूर्यग्रहण के समय सूर्य से सम्बंधित अन्य जानकारी भी हासिल होती है। यह तप्त गैसों की आंधी सूर्य की सतह से उठती हुई लपटों के द्वारा बनती है। सूर्य से उठती हुई इन रक्त ज्वालाओं को सौर ज्वालाएं कहते हैं। हमें कभी-कभी सूर्य की सतह पर एक प्रकार के धब्बे दिखाई पड़ते हैं जिन्हेें सौर्यकलंक कहा जाता है।
वास्तव में सौर्यकलंक प्रकाषमंडल के वे क्षेत्र होते हैं जहां का तापमान चारों के तरफ के तापमान की तुलना में 1500ज्ञ कम होता है। सर्वप्रथम गैलीलियो ने बताया कि नग्न आंखों से भी दिखाई पड़ने वाले सौरकलंक सूर्य के धरातल पर बनते हैं। एक सौरकलंक का जीवन-काल कुछ घंटों से लेकर कुछ माह तक होता है। ये सर्वप्रथम लगभग 1500 किमी. ब्यास के छिद्र सदृष दिखते हैं। इनके आन्तरिक काले भाग को अम्ब्रा तथा चारों ओर स्थित अपेक्षाकृत कम काले भाग को पेनम्ब्रा कहा जाता है। अधिकतम सौरकलंक लगभग 11.1 वर्ष के अन्तराल पर होता है, किन्तु यह 8 से 16 वर्ष के मध्य विचलित होता है। क्यों पाठकों है न आष्चर्य की बात, हम मनुष्य अपने आपको कलंकरहित कहने से कभी नहीं चुकते जबकि सच्चाई यह है कि अपार तेजवान, ऊर्जावान होते हुए सूर्य इस कलंक से नहीं बच सका तो हमारी क्या विसात है।
सूर्य का जो भाग हमें आंखों से दिखाई देता है उसे प्रकाषमण्डल कहते हैं। इसका ताप अत्यंत प्रचण्ड रहता है। सूर्य के गर्भ का ताप चार करेाड़ डिग्री सेण्टीग्रेट हो सकता है। यदि सूर्य से निकलने समस्त गर्मी केंद्रीभूत कर दिया जाये तो 15 करोड़ किमी. लम्बी तथा सवा दो किमी. मोटी बर्फ की चट्टान एक सेकेण्ड में गलकर पानी हो जायेगी और आठ सेकेण्ड में भाप बनकर उड़ जायेगी। हम सूर्य की गर्मी का अंदाजा इस बात से भी लगा सकते हैं कि यदि सूर्य के पिण्ड का एक पिन के सिर के बराबर भाग हमारी पृथ्वी आ गिरे तो उसकी गर्मी से 1500 किमी. के आसपास की समस्त वस्तुएं भस्म हो जायेंगी। सूर्य के प्रकाष का अंदाजा लगाते हुए जेम्सजीन्स कहते हैं कि यदि 6 लाख चन्द्रमा एकत्रित कर दिये जायें तो कहीं जाकर सूर्य के बराबर प्रकाष मिल सकेगा। सूर्य के चारों ओर हमें एक पट्टी सी दिखाई देती है जिसे सूर्य का मुकूट कहते हैं। सूर्य का मुकूट लाखों किमी तक इसकी सतह को घेरे रहता है, इसमें बहुत अधिक प्रकाष होता है। यह मुकूट सूर्य की सतह के बाहर है इसीलिए सूर्य के निजी अक्ष भ्रमण के साथ यह नहीं घूमता है। सूर्य के इस मुकूट की उत्पत्ति शायद उन परमाणुओं और विद्युतकणों से है जो सूर्य की ज्वालाओं द्वारा हर समय वेग के साथ बाहर फेंके जाने से सूर्य की सतह के चारों ओर फैलते रहते हैं। सूर्य के प्रकाष के तेजी के कारण यह हमेषा दिखाई नहीं देता, किन्तु सूर्य-ग्रहण के समय बिल्कुल साफ दिखाई पड़ता है, और इसके प्रकाष के कारण हमारी पृथ्वी काफी प्रकाषमान रहती है।
मुझे लगता है अब आप लोग सूर्य की गर्मी से बहुत ही परेषान हो गये हैं और काफी कुछ यहां घुम भी लिया अब यहां और अधिक रूकना समय और सेहत की बरबादी के अलावा और कुछ नहीं है। अतः एक बुद्धिमान पर्यटक की भांति हमें अपने यान को मोड़ लेते हैं और चलते हैं परिवार के अन्य सदस्य ग्रहों के यहां।
प्रिय पाठकों आइये इनसे मिलें जो अपने पिता सूर्य के बिल्कुल पास बैठे हैं। जी हां, ये हैं बुध, जो सूर्य के सबसे छोटे पुत्र हैं। छोटी संतानें अपने मां-बाप की सबसे प्रिय होती हैं, शायद इसीलिए बुध अपने पिता से बिल्कुल सटकर बैठा है। बुध का हुलिया देखने के बाद जो निष्कर्ष हम निकालते हैं वह कुछ इस प्रकार है....
इसका ब्यास लगभग 5000 किमी. है। आयतन में यह पृथ्वी का बिसवां भाग है। पहले यह विष्वास किया जाता था कि बुध ग्रह की कक्षीय तथा अक्षीय दोनों गतियां बराबर अर्थात अट्ठासी-अट्ठासी दिन की होती हैं, परंतु बाद में राडार परीक्षणों से स्पष्ट हुआ कि इसकी कक्षीय गति तो वही है परंतु अक्षीय गति 58.65 दिन की ही होती है। यहां एक भाग में अधिक गर्मी है तो दूसरे में अत्यंत ही ठण्डक है। बुध प्रतिदिन सूर्यादय के दोेेेेेेेेेे घंटे पहले उदय होता है, इसीलिए इसे भोर का तारा कहते हैं। यह क्षितिज से ऊपर नहीं उठ पाता है। बुध अधिक चमकीला ग्रह है। चन्द्रमा की तरह बुध की भी कलाएं दिखाई देेती हैं। जब यह पृथ्वी ओर सूर्य के सीध में होता है तो उसका पूर्ण प्रकाषित पिण्ड दिखाई देता है। किंतु वह जब पृथ्वी और सूर्य के बीच में आ जाता है तो वह हमें दिखाई नहीं देता किंतु ऐसा बहुत कम ही होता है, क्योंकि इसकी धूरी सूर्य के मार्ग से तिरछी रहती है। जब कभी बुध सूर्य के सामने पड़ जाता है तो वह सूर्य पर छोेटे से गोल धब्बे के रूप में दिखाई देता है। बुध का आकार अत्यंत छोटा है तथा वहां तापमान भी अधिक है इसी कारण यहां वायुमण्डल नहीं पाया जाता। वायुमण्डल की अनुपस्थिति के कारण तथा अन्य कई कारणों से ही यहां जीवन नहीं पाया जाता। बुध ग्रह सबसे अधिक तापंातर वाला ग्रह है। वैसे सूर्य के सबसे नजदीक होने के कारण यहां का तापमान सर्वाधिक होना चाहिए परंतु इस मामले में शुक्र इससे आगे है, शुक्र ग्रह का तापमान सर्वाधिक है ऐसा क्यों इसका कारण जब हम शुक्र के पास चलेंगे तो उसी से पुछ लेंगे। बुध ग्रह की अपनी कोई संतान अर्थात उपग्रह नहीं है।
मुझे लगता है कि हम लोगों ने बुध महाषय का काफी समय लिया आइये इनका धन्यवाद बोलें और यहीं से थोड़ी दूरी पर बैठे हैं शुक्र जी, उनसे मिलते हैं। जो कि काफी चमक रहे हैं शायद अभी-अभी नहा धोकर बैठे हैं।
ये हैं सौरपरिवार के सबसे साफ-सुथरे तथा चमकीले सदस्य शुक्र जी। जोकि भारतीय पौराणक कहानियों में शुक महराज के नाम से प्रसिद्ध हैं। ये राक्षसों का सदा हित चाहने वाले आचार्य शुक्राचार्य जी हैं। इनके तिव्र चमक के बारे में इनसे पुछने पर ये बता रहें कि इनके वायुमण्डल में कार्बनडाईआक्साइड की मात्रा सवार्धिक है जिसके कारण यहां प्रेषर कुकर दषा या ग्रीन हाउस प्रभाव उत्पन्न होता है। जिसके कारण यहां का तापमान दिन प्रतिदिन बढ़ ही रहा है। इसी बढ़ते हुए तापमान के कारण ही यह अपने परिवार में सबसे चमकीला ग्रहा है। अधिक चमकीला होने तथा ऐसा प्रतीत होने कि जैसे इसमें खुद का प्रकाष है यह तारा की संज्ञा भी पा जाता है। चूंकि यह भोर तथा संध्या दोनों समयों में दिखाई देता है इसीलिए इसे भोर तथा संध्या का तारा भी कहते हैं। शुक्र का आकार तथा औसत घनत्व पृथ्वी के लगभग बराबर है, तथा ब्यास 12872 किमी. है जो कि पृथ्वी के लगभग बराबर है इसीकारण इसको पृथ्वी की जुड़वा बहन भी कहते हैं। इसकी कक्षीय अवधि 226 दिन तथा अक्षीय अवधि 243 दिन है, अर्थात इसका एक वर्ष इसके एक दिन से छोटा है। ध्यातब्य है कि- जितने समय में कोई ग्रह अपने पिता तारे की एक परिक्रमा पूरी कर लेता है वह समय उस ग्रह का एक वर्ष होता है। इसीतरह कोई ग्रह जितने समय में अपने धुरी पर एक परिक्रमा कर लेता है उस समय को उस ग्रह का एक दिन कहते हैं। ग्रहों का अपने धुरी पर घूमना परिभ्रमण तथा अपनी कक्षा में सूर्य के चारों तरफ घूमना परिक्रमण गति कहलाती है। शुक्र ग्रह की जो एक और खास बात है वह यह कि शुक्र अपनी धुरी अर्थात कक्ष पर घड़ी की सुई के अनुरूप;बसवबा ूपेमद्ध या पुरब से पष्चिम की तरफ घूमता है। पृथ्वी की तरह यहां भी वायुमण्डल है , इसमें भी बादल उठते है, जिसके कारण उस पर कभी-कभी हल्के रंग के भद्दे धब्बे दिखाई देते हैं। बुध की तरह शुक्र की भी अपनी कोई संतान अर्थात उपग्रह नहीं हैं।
पाठकों मुझे लगता है कि अब आप लोग शुक्र का भी काफी हद तक निरीक्षण व यात्रा कर लिए तथा यात्रा से काफी थक व उब भी चुके होंगे अतः अब हम थोड़ा विश्राम के लिए चलते हैं पृथ्वी पर जहां का वातावरण आपको अत्यंत ही सुखद व थकावरहित महसूस होगा
हमारी पृथ्वी अपने परिवार की सबसे अनुपम सदस्य है............
ं
.........क्रमशः


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