(Manoj bind)
काल के कठोर थपेड़ों से आहत उम्र के अंतिम दहलीज पर पेट अपने अस्तित्व को पीठ के हवाले कर चुका था। चेहरे पर पड़ी गहरी काली झुर्रियां असंख्य रेखाओं के रूप में मानों अतीत के कठोर इतिहास को लिपिबद्ध किए हुए है। दुर से देखने में यह चेहरा ऐसा प्रतीत हो रहा था मानों किसी ने गंदे काले मटमैले जल के सरोवर में कंकड़ फेंक दिया हो। फलस्वरूप उस जल में झुर्रियों के रूप में तरंगें उठ रही हैं। इसी के मध्य मुरझाए हुए कमल के सदृष्य दोनों आंखें हर किसी से कुछ कहने का प्रयास कर रही हैं। माथे की रेखाएं गहरी पड़ गयी थी। पैर इस तरह से फटा था मानों किसी ताल की काली मिट्टी में दरार पड़ी हो। रह-रहकर उसमें से रक्त ऐसे बह जाता मानो मिट्टी की इन दरारों से लाल जल का सोता फुट गया हो।
काल के कठोर थपेड़ों से आहत उम्र के अंतिम दहलीज पर पेट अपने अस्तित्व को पीठ के हवाले कर चुका था। चेहरे पर पड़ी गहरी काली झुर्रियां असंख्य रेखाओं के रूप में मानों अतीत के कठोर इतिहास को लिपिबद्ध किए हुए है। दुर से देखने में यह चेहरा ऐसा प्रतीत हो रहा था मानों किसी ने गंदे काले मटमैले जल के सरोवर में कंकड़ फेंक दिया हो। फलस्वरूप उस जल में झुर्रियों के रूप में तरंगें उठ रही हैं। इसी के मध्य मुरझाए हुए कमल के सदृष्य दोनों आंखें हर किसी से कुछ कहने का प्रयास कर रही हैं। माथे की रेखाएं गहरी पड़ गयी थी। पैर इस तरह से फटा था मानों किसी ताल की काली मिट्टी में दरार पड़ी हो। रह-रहकर उसमें से रक्त ऐसे बह जाता मानो मिट्टी की इन दरारों से लाल जल का सोता फुट गया हो।
समाज व परिवार से तिरस्कृत, बहिस्कृत, शोषित फटे पुराने गुदड़ी में लिपटी हुई यह औरत सदृश्य काया मेरे कालेज के गेट पर एक बड़ा सा जस्ते का कटोरा लिए थी जो कि कई जगह से पिचक गया था, जिसका उपयोग वह खाने और पानी पीने में भी किया करती थी, लेकर बैठी थी। उसके इस भौतिक स्वरूप को लोग भिखारिन की संज्ञा देकर उसके प्रति संज्ञा शून्य हो जाते थे।
मैं जैसे ही कालेज के गेट पर पहुॅंचता उसे देखकर रूक जाता। कुछ पल उसे ध्यान से देखता और उसके सुस्त पड़ चुके हृदय में छिपे दुखों के समुंदर में गोते लगाकर विषाद रत्न ढंुढने का प्रयास करता, कि तभी मेरे कानों में दुख भरी एक नमकीन लहर घुल जाती।
बेटाऽऽ.......कुछ दे दो बेटाऽऽ.........भगवान तुम्हें लम्बी उमर देगा। कुछ दे दो बेटाऽऽऽ......।
तार्किकता और बौद्धिकता के परिवेश से प्रभावित मेरा मन कभी भी इस दर्द भरी आवाज की ब्याख्या भावनात्मक स्तर से नहीं किया था। करता भी कैसे हर तथ्य को तार्किक और बौद्धिक ढंग से कहने और समझने की आदत सी जो पड़ गयी थी। तर्क के भंवर में फंसकर भावना अपने अस्तित्व को बचाने के लिए संघर्ष करती। सोचता कि जो बुढि़या मेरे लिए ऐसी दुवाएं कर रही है यदि उसकी दुआवों में प्रभाव होता तो वह अपने लिए भगवान से कुछ क्यों नही मांग लेती। शायद मैं यह भूल गया था कि दुवाओं का प्रभाव प्रत्यक्ष नहीं होता और यह भी भूल गया था कि जब दुखों के बादल घिरते हैं तो श्रद्धा और विश्वास का धरातल भी कीचड़ बन जाता है। ऐसे में दुवाओं का प्रभाव भला कैसे होता।
अब उसकी बात को मैं वहीं अचेतना के सीवर में डालकर आगे बढ़ लेता। यह दर्द भरी आवाज बिल्कुल हुबहू मुझे तब भी सुनाई पड़ती जब मैं गेट से बाहर निकलता। मैं क्या कालेज में लगभग एक हजार से अधिक छात्र थेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेे। लगभग सबके साथ यह घटना घटती। कोई भी गेट से प्रवेश करे या बाहर जाये सबको आशा भरी निगाह से देखती और वेदना भरी आवाज में टेपरिकार्ड की तरह बजती रहती-
भगवान के नाम पर कुछ दे दो बेटा .......भगवान तुम्हें लम्बी उमर देगा.........। शायद लम्बी उमर मांगने के अलावा उसे दुवाओं का कोई दुसरा जुमला आता ही नहीं था।
एक दिन जब मैं घर जाने के लिए अपनी उम्रदराज साइकिल को लेकर गेट पर पहुॅचा तो ठिठककर रूक गया। जो बुढिया रोज बैठी रहती थी वह आज लेटी हुई थी। उसके कपड़े अस्त-ब्यस्त पड़े थे। जस्ते का पिचका हुआ कटोरा दुर पड़ा था। मुख से निकलने वाली दर्दभरी आवाज मेरे हृदय को हजारों टुकड़े करती हुई वायुमण्डल में विलुप्त हो जाती।
बेटवाऽऽऽ.................मुन्नाऽऽऽ.............भइयाऽऽऽ.........मेरे लाल बहुत भूख लगी है मेरे लाल............यह आवाज उसके जिह््वा से नही बल्कि उसके पीठ में छुप चुके पेट की अतृप्ति दीवारों को रगड़कर आ रही थी और मेरे तार्किकता के भंवर के वेग को मंद कर रही थीं, उसमें फंसी भावना अश्रुपूरित नेत्रों से भंवर के बाहर आ गयी थी। मैं चाहकर भी आगे न बढ़ सका। साइकिल को दीवार से सटाकर खड़ाकर बिल्कुल वहां जाकर खड़ा हुआ जहां से इस आवाज की वेदनात्मक संवेदना निकलकर मेरे कानों में घुल रही थी।
वह महिला (बृद्धा) भी अपनी आंखों को बंद किए हुए कराहते हुए एक ही लय में पीड़ा की पराकाष्ठा को झेलते हुए कहे जा रही है-
बेटवाऽऽ..........भइया...........मुन्ना............मेरे लाल.........बहुत भूख लगी है बेटाऽऽ.........।
मैं सोचा रोज भगवान के नाम पर मांगने वाली आज भगवान को भुल गयी है। क्या भगवान पर से इसका बचा-खुचा विश्वास भी खत्म हो गया ? नहीं-नहीं ऐसा नहीं हो सकता। ईश्वर का अस्तित्व तो हर समय अपने एक ही रूप में रहा है। हमने उसके प्रति जैसी श्रद्धा जैसा विश्वास दिखाया उसका प्रतिफल हमें वैसा ही मिला। हमने जैसा कर्म किया हमें उसका प्रतिफल वैसा मिला। परंतु इस बुढिया ने किसी का भला क्या............तभी उसकी दर्द भरी आवाज ने मेरे इस मस्तिष्क द्वण्द को बीच में ही विराम लगा दिया।
आधा कंकाल बन चुकी इस शरीर से प्रस्फुटित एक शब्द मेरे मस्तिष्क में अब बवंडर की तरह चक्कर मारते हुए कौंधने लगा। हालांकि इससे पहले भी मैं इस शब्द को सुन चुका था परंतु पहले ऐसी संवेदनात्मक अनुभूति मुझे कभी नहीं हुई थी। वह शब्द था “बेटा”। जो किसी मां के मुख से नहीं बल्कि उसके उस पेट से, उस कोख से निकलता है जिसमें रखकर मां अपने बच्चे की हिफाजत और उसका पोषण करती है। परंतु हाय रे विधि की विडम्बना आज एक मां सुरक्षा की कल्पना से परे भूख से तड़प रही है। लगा कि मुझे मेरी मां बुला रही है। हां मां ही तो थी तभी तो उसने मुझे बेटा कहा, मुझे ही क्यों वह पुरे विद्यालय को कुटुम्ब के रूप में देखती। सबको बेटा या बेटी कहती तो मेरी ही क्यों ? वह तो हजार एक की माॅं है। तो फिर इन हजारों में से अब तक किसी एक ने भी उसके दर्द भरी आवाज को क्यों नहीं महसूस किया। क्या उसके इन हजारों बेटों में से एक भी लायक नहीं है। क्या प्रकृति इतनी निष्ठुर हो गयी है।
नहीं-नहीं मैं जो हूं। मैं पुत्र के दायित्व को निभाउंगा। मैं मां को उसका हक दूंगा। मैं अपने आपको रोक नहीं पाया। हाथ में ली हुई पुस्तक एक तरफ रखकर मां के चेहरे पर झुककर घुटने के बल बैठ गया। अपने दाहिने हाथ को मां के माथे पर रखा, ऐसा लगा जैसे मैंने अपने हाथ को किसी गर्म तावे पर रख दिया हो। बुखार से पुरा शरीर जल रहा था।
मेरे हाथों के स्पर्स से उसने आॅंखें खोली तो ऐसा लगा जैसे किसी तरंगित गंदे सरोवर में मुरझाये हुए दो लाल कमल कहीं से एकाएक खिल गये हों। चेहरे की झुर्रियां गहरी पड़ गयी, जबड़े की मांसपेशियों में कसाव आया, सूख चुके होंठों में कम्पन हुआ, थकी हुई जिह्वा को गति मिली-
’कौनऽऽन.........कौन है बेटा।‘
’मैं हूं मां, तुम्हारा बेटा।‘
’मेरा बेटा ! अरे हां मेरे तो बहुत सारे बेटे हैं।‘ उठने का प्रयास करते हुए।
’तुम पहली बार मेरे पास आए हो न। जरा तुम्हें अच्छी तरह देख लूं।‘
’रूको मां मैं तुम्हें उठाता हूं।‘ बैठाकर मैने मां के सिर को अपने बाजुओं के सहारे टिका कर बैठ गया।
मां के बेजान से खुरदुरे हाथ मेरे गालों पर जाकर फिसलने लगे। उस समय मां की पथराई आॅंखों से निकलने वाले निश्छल प्रेम के आॅंसू की गर्माहट शायद प्रेम की चरम पराकाष्ठा की सोदाहरण ब्याख्या कर रहे थे। ऐसा प्रेम जो किसी दीवार किसी बंधन की सीमा के परे होता है। मां ने खरखराते हुए गले से कहा-
’बेटा मुझे विश्वास था कि एक दिन मेरा कोई न कोई बेटा मेरी कराह जरूर सुनेगा और मुझे मां कहेगा।‘
गेट से होकर जितने भी लड़के जाते सब मुझे इस तरह से बुढि़या जिन्हें वे भिखारिन कहते से लिपटा देखकर आश्चर्य से मुझे देखने लगते। मां उनकी तरफ निगाह उठाती और धीरे से कहती-
’देखो बेटा वह भी मेरा बेेटा है।‘
’हां माॅं! वही क्यों इधर देखो ये सब भी तो तुम्हारे ही बेटे हैं।‘ मैंने बगल में पान गुटके की दुकान की ओर इशारा करते हुए कहा। और आगे भी बोला-
’ये सब तो तुम्हारे हीे बेटे हैं न मां जो सैकड़ो रूपये पान गुटके पर फुंककर अपने शरीर अपनी आत्मा को जला रहे हैं। काश ! उसी में से एक रूपया भी आज तुम्हें मिल गया होता तो मां आज तुम्हारी यह हालत न होती।‘
’परंतु मुझे अपने इन बच्चों से कोई शिकायत नहीं है।‘ मां ने अत्यंत शालीनता के साथ यह कहा।‘
’यही तो मां की महानता है। पुत्र कितना ही कुपूत्र क्यों न हो जाये मां के लिए वह पुत्र ही रहता है।‘
’अच्छा मां तुम्हें भूख लगी है न चलो तुम्हें खाना खिलाऊॅं.........परंतु तुम्हें तो बहुत तेज बुखार है मां। चलो पहले तुम्हें दवा दिलाते हैं।‘
मां को वहां से ले जाने के लिए मुझे किसी की मदद की आवश्यकता थी। वैसे कोई भी इस काम में मेेरी मदद नहीं करता। इस लिए मैंने अपने सुख-दुख के साथी, अपने सबसे अच्छे दोस्त गीता को बुलाया। वह मुझे अजीब तरह से देखते हुए माथे को सिकोड़ते हुए बोेेेली-
’क्या है मनोज ? ये क्या कर रहे हो ?‘
’गीता प्लीज मेरी मदद करो । मां को उठाकर उस क्लीनिक तक ले चलना है। बहुत तेज बुखर है मां को।‘ मैंने अत्यंत निवेदन के साथ यह कहा था। परंतु वह अत्यंत आश्चर्य मिश्रित आवाज में भौहों को सिकोड़ते हुए बोली-
’क्याऽऽ.........ये तुम्हारी मां है ? ये तो भिखारिन है मनोज।‘
मैं अपने जज्बातों को रोक नहीं पाया और फुट पड़ा-
’तुमने क्या कहा दोस्त कि ये भिखारिन है ? मैं तुमसे पुछता हुं कि क्याऽऽ......मेरी मां भिखारिन हो सकती है ? तुम्हारी माॅं भिखारिन हो सकती है या हममें से किसी की मां भिाखारिन हो सकती है ? यदि हां तो सचमुच यह भिखारिन ही हमारी मां है गीता। क्या इसने कभी तुम्हें बेटी नहीं कहा या मुझे बेटा नहीं कहा ?‘
’कहा है मनोज।‘ गीता ने अत्यंत शालीनता के साथ उत्तर दिया।
’तो बताओ दोस्त जिस भाव से तुम्हारी माॅं तुम्हें बेटी और मेरी माॅं मुझे बेटा कहती है यदि उसी भाव से इसने हमें बेटी और बेटा कहा तो आखिर क्या अंतर है उस माॅं और इस माॅं में, बोलो दोस्त।‘ कहते-कहते मेरा गला भर आया था। गीता भी भावुक होकर मुझे देखने लगी और धीरे से बोली-
’आइ एम साॅरी मनोज। मुझे माफ कर दो। मैं तुम्हारी भावनाओं को समझ नहीं सकी। चलो उठाओ माॅं को हम इन्हें क्लीनिक ले चलते हैं।‘
हम दोनों दोस्त माॅं को क्लीनिक ले जाकर उसकी दवा करायें। चूंकि गीता का घर वहीं क्लीनिक के पास में ही था अतः बिना किसकी परेशानी के वह माॅं की निश्छल भाव से लगन के साथ सेवा की। उसकी सेवा का ही फल था कि माॅं जो कि गले में कफ बढ़ जाने के कारण बोल नहीं पा रही थी, अब बोलने लगी थी। गीता अपने घर से माॅं के लिए नियमित खाना लाती और अपने हाथों से खिलाती। माॅं की तबीयत अब बिल्कुल ठीक थी। फिर भी डाक्टर ने एक दिन आौर रूकने को कहा था।
आज माॅं हम दोनों के सामने बैठकर अपने हााथ से भरपेट भोजन की। माॅं के चेहरे पर संतुष्टि के भाव देखकर हम दोनों के चेहरे पर भी संतुष्टि के भाव उभर आये। खाते-खाते माॅं के आॅंखों से आंसू छलक आये। संवेदना की सरिता भावुकता के सरोवर से बह निकली। होठों पर जैसे भूकम्प आ गया हो।
’क्या हुआ माॅं ?‘ गीता माॅं की दशा देखकर बोल पड़ी थी।
’कुछ नहीं मेरे बच्चों। बस यूं ही मन भर आया, न जाने किस जन्म का तुम्हारा हमारा नाता है जो तुम लोग मेरी इतनी................
’अरे माॅं तुम भी, अरे तुम्हारा हमारा नाता किसकी और जन्म का नहीं माॅं बल्कि इसी जन्म का तो है। आखिर तुम्हीं तो हमें बेटी और बेटा कहती हो न।‘ गीता मां के आंसू पोंछते हुए बोली थी।
’खा लो माॅं कल तुम्हें यहाॅं से छुट्टी मिल जायेगी।‘
’अच्छा माॅं अब हम लोग चलेंगे।‘
आते वक्त हम दोनों माॅं के पैर छुने लगे तो माॅं बोल पड़ी-
’जुग-जुग जिओ मेरे बच्चों मेरी भी उमर तुम लोगों को लग जाय।‘
दुसरे दिन सुबह जल्दी-जल्दी तैयार होकर विद्यालय की कुछ पुस्तकें लिया और साइकिल उठाकर सबसे पहले गीता के घर गया। वहाॅं से उसको लिया आौर साथ में टिफिन भी पैक किया फिर हम दोनों क्लीनिक पर पहुॅंचे। डाक्टर ने डिसचार्ज बिल बनायी और हमें डिसचार्ज कार्ड दे दिया। हम दोनों तिव्र कदमों से माॅं के बेड के पास पहुॅंचे। शायद माॅं सो रही थी। हमने धीरे से माॅं को जगाने का प्रयास किया। परंतु माॅं के शरीर में कहीं जरा भी हरकत नहीं हुई। मेरा मन किसकी अनिष्ट की आशंका से घबरा गया। तुरंत डाक्टर को बुलाया। डाक्टर ने हर तरह से चेक किया। फिर भारी मन से बोला-
’आइ एम साॅरी...........‘
‘नहीं-नहीं डाक्टर साहब ऐसा नहीं हो सकता। वह हमें छोड़कर नहीं जा सकती। वह सिर्फ हम दोनों की नहीं हमारे जैसे हजारों की माॅं थी। वह अपने हजारों बच्चों को छोड़कर ऐसे नहीं जा सकती। हमारी माॅ जिंदा है न डाक्टर साहब ?‘
’आइ एम सो साॅरी मि. मनोज। सी डेड।‘
’क्या..............................‘
गीता का रो-रोकर बुरा हाल हो रहा था। मैंने उसे समझाया-
’चलो उठो गीता, लगता है माॅं की दुआएं हमें लग गयी। उसी ने तो कल कहा था- मेरे बच्चों मेरी भी उमर तुम्हें लग जाये।‘
यह सुन गीता की आॅंखें शून्य में न जाने कहाॅं खो गयी। मैं भी शुन्य में तलाशने लगा। शायद कहीं...............
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