अतीत के आईने में वंचितो को न्याय दिलाने की जदोजहद

Saturday, January 3, 2015

संघर्ष ही मेरा जीवन है

मैंने एक सपना देखा है, सबके लिए शांति हो, काम हो, रोटी हो, पानी और नमक हो। जहां हम सबकी आत्मा, शरीर और मस्तिष्क को समझ सके और एक-दूसरे की जरूरतों को पूरा कर सकें। ऐसी दुनिया बनाने के लिए अभी मीलों चलना बाकी है। हमें अभी चलना है, चलते रहना है।- नेल्सन मंडेला


''संघर्ष ही मेरा जीवन है, मैं स्वाधीनता की प्राप्ति के लिए जीवन पर्यन्त संघर्ष करता रहूँगा'' के उद्धोषक नेल्सन मण्डेला बीसवीं शताब्दी के इन अंतिम वर्षों में विश्व के एक सर्वाधिक चर्चित व्यक्ति बन गये । वस्तुत: यदि हम कहें कि वह स्वजाति के उत्थान और वर्णभेद जैसी घृणा के विरुध्द संघर्ष के प्रतीक बन गये, तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। इसी उद्देश्य के लिए उन्हें एक चौथाई शताब्दी से भी अधिक समय के लिए कारावास की यन्त्रणाओं का सामना करना पड़ा। किन्तु ये कठोर यन्त्रणाएं उनके मनोबल को डिगा पाने में असमर्थ रहीं। अपनी अदम्य इच्छाशक्ति और अप्रतिम साहस के कारण आज वह विश्व के एक अद्भुत जननायक बन गये। आज जहां एक ओर अनन्त का भी अन्त पाने के प्रयास हो रहे हैं, मानव ने अपनी सुखसाधना के लिए अनेक असम्भव प्रतीत होने वाले कार्यों को भी संभव कर दिखाया है, वहीं विश्व की विध्वंसात्मक प्रवृत्तियां उसके सब किये कराये पर पानी फेर देने को उद्यत हैं। जहां एक ओर विश्व राष्ट्र जैसी उदात्त कल्पनाएं हैं और 'मनुष्य मात्र बन्धु है' जैसे श्रेष्ठ विचार हैं, वहीं मान्यता के शत्रु धर्म, वर्ण, जाति आदि का आश्रय लेकर इन समस्त उपलब्धियों को अर्थहीन करने की चेष्टा कर रहे हैं। साम्प्रदायिकता और क्षेत्रीय पृथकतावाद आज विश्व के लिए सबसे बड़ी समस्याएं बन गयी हैं। साम्प्रदायिक वैमनस्य एक अन्तर्राष्ट्रीय समस्या है। संप्रदायों-धर्मों की परस्पर प्रतिद्वन्द्विता, जातिगत विद्वेष, श्वेत-अश्वेत का भेद आदि इसी भावना के अनेक रूप हैं। वर्तमान में दक्षिण अफ्रीका श्वेत (गोरे)-अश्वेत (काले) के बीच भेद भावना का प्रत्यक्ष उदाहरण है। इसी भावना को समाप्त कर मानव मात्र को समानता का अधिकार प्रदान कराने के लिए नेल्सन मण्डेला ने संघर्ष-मार्ग का वरण किया है।

Monday, November 24, 2014

क्या है टैक्स यानि कर ( टैक्स की बृहत् जानकारी)

क्या है टैक्स यानि कर                                     

प्रिय पाठकों ,   
सामाजिक कल्याण के दृष्टिकोण से सरकार द्वारा आरोपित किया जाने वाला अतिरिक्त मौद्रिक भाग कर कहलाता है। जबकि सरकार के द्वारा प्रदान की गयी सुविधाओं के बदले वहन किया जाने वाला अतिरिक्त मुद्रा का भाग शुल्क कहलाता है। इसके अतिरिक्त कर अनिवार्य होता है जबकि शुल्क स्वैच्छिक होता है। 
सब्सिडी- उत्पादन लागत का वह भाग जिसे सरकार के द्वारा वहन किया जाता है सब्सिडी कहलाता है। सब्सिडी के निम्न स्वरूप निर्धारित किये गये हैं-   
1. ब्लू सब्सिडी
2. ग्रीन सब्सिडी
3. क्रॅास सब्सिडी
            जब सरकार के द्वारा अर्थब्यवस्था के द्वितीयक तथा तृतीयक क्षेत्र से सम्बंधित सेवाओं के उत्पादन पर सब्सिडी प्रदान किया जाता है तब इसे ही ब्लू सब्सिडी कहा जाता है। जबकि अर्थब्यवस्था के कृषि क्षेत्र में प्रदान किए गये सब्सिडी को ग्रीन सब्सिडी कहा जाता है। वस्तुतः जब सरकार के द्वारा प्रदान की गयी सब्सिडी की राषि को किसी अन्य माध्यम से पूरा कर लिया जाता है तब सरकार द्वारा प्रदान की गयी ऐसी ही सब्सिडी को क्रास सब्सिडी कहा जाता है। उदाहरण के लिए रेलवे विभाग के द्वारा यात्रा के समय यात्रियों को जो सब्सिडी प्रदान की जाती है उसे वस्तु ढ़ुलाई करने वाली ट्रेन के माध्यम से पूरा कर लिया जाता है। इस तरह रेलवे के द्वारा रेल यात्रियों के रेल यात्रा पर दी गयी सब्सिडी क्रास सब्सिडी कहलाएगी।
प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष करः-
                      प्रत्यक्ष कर एवं अप्रत्यक्ष कर के बीच वर्गीकरण के आधार को समझने के लिए कराधान, कराघात एवं करापात शब्द की अवधारणा को समझना अनिवार्य है। कराधान का शाब्दिक अर्थ होता है अर्थब्यवस्था में कर से सम्बंधित कानून को लागू करना, जबकि कराघात का अर्थ होता है कर का आघात अथवा कर को आरोपित करना एवं करापात का षाब्दिक अर्थ होता है कर के भार को अंतिम रूप में सहन करना।
प्रत्यक्ष करः- कराधान के पश्चात जब किसी ब्यक्ति अथवा संस्था पर कराघात एवं करापात साथ-साथ होता है तब कर की ऐसी ही प्रकृति को प्रत्यक्ष कर कहा जाता है। दूसरे शब्दों में अर्थब्यवस्था में कर से सम्बंधित कानून को लागू करने के बाद जिस ब्यक्ति अथवा संस्था के ऊपर कर को आरोपित किया  जात है। उसी ब्यक्ति अथवा संस्था के द्वारा कर के भार का अंतिम रूप में सहन भी कर लिया जाता है, तब कर की ऐसी ही प्रकृति को प्रत्यक्ष कर कहा जाता है। प्रत्यक्ष कर के उदाहरण हैं- आयकर, ब्यय कर, निगम कर, सम्पदा कर, सम्पत्ति कर, उत्तराधिकारकर, धनकर, उपहार कर, मृत्युकर इत्यादि।
आयकर- ब्यक्तियों के ब्यक्तिगत आय के ऊपर एक वित्तीय वर्ष में आरोपित किया जाने वाला कर आय कर कहलाता है। भारत में आयकर सर्वप्रथम लार्ड केनिंग के शासन काल में 1860 ई. में जेम्स विल्सन के द्वारा आरोपित किया गया था। भारत में आयकर 1885 ई. के पूर्व तक अस्थाई रूप से लागू किया जाता रहा, किंतु 1884-85 वित्तीय वर्ष से आयकर को भारत में स्थाई रूप से लागू किया जाने लगा।
ब्यय कर- अर्थब्यवस्था में एक वित्तीय वर्ष के अंतर्गत ब्यक्तियों के कुल क्रय शक्ति के ऊपर आरोपित किया जाने वाला कर ब्यय कर कहलाता है। भारत में ब्यय कर सर्वप्रथम 1956 में केल्डार समीति के सिफारिष पर लागू किया गया था, किन्तु ब्यय कर को 1962 में समाप्त कर दिया गया ।
निगम कर- अर्थब्यवस्था में एक वित्तीय वर्ष में ब्यवसायिक संस्थाओं के कुल लाभ के ऊपर आरोपित किया जाने वाला कर निगम कर कहलाता है। निगम कर को कम्पनी लाभ कर के रूप में भी सम्बोधित किया जाता है। निगम कर को सुपर टैक्स अथवा सर्वोच्च कर भी कहा जाता है। 
निगम कर को सर्वोच्च कर कहा जाता है क्यों ?
माना किसी कम्पनी में सदस्यों की कुल संख्या 10 है एवं निगम कर की दर 10 प्रतिषत है। माना कम्पनी केा एक वित्तीय वर्ष में कुल लाभ 200 रूपये का होता है। निगम कर के रूप में 200 का 10 प्रतिषत अर्थात 20 रूपये ले लिया जायेगा। शुद्ध लाभ बचा 180 रूपये शुद्ध लाभ का वितरण कम्पनी के सदस्यों के बीच करने पर प्रत्येक सदस्य को लाभ के रूप में जो 18 रूपये की राषि प्राप्त होती है। सरकार इस ब्यक्तिगत लाभ के ऊपर पुनः कर आरोपित कर देती है। चूंकि कर के ऊपर कर आरोपित किया जाता है। इसलिए ऐसे कर को सर्वाेच्च कर कहा जाता है।
सम्पदा कर- ब्यक्तियों के द्वारा अपने वर्तमान समय तक अर्जित की गयी कुल सम्पत्ति के ऊपर आरोपित किये जाने वाला कर सम्पदा कर कहा जाता है। 
सम्पत्ति कर- किसी ब्यक्ति के द्वारा उसकी कुल सम्पत्ति में हुई बृद्धि के ऊपर आरोपित किये जाने वाला कर सम्पत्ति कर कहलाता है।
मृत्यु कर- एक ब्यक्ति के द्वारा अपनी सम्पूर्ण जीवन अवधि में अर्जित किए गये कुल सम्पत्ति के ऊपर मृत्यु के पश्चात जो कर आरोपित किया जाता है मृत्यु कर कहलाता है।
उत्तराधिकार कर- ब्यक्ति के मृत्यु के पश्चात छोड़े गये सम्पदा के उत्तराधिकारियों के बीच हस्तांतरण के समय जो कर आरोपित किया जाता है उत्तराधिकार कर कहा जाता है।

अप्रत्यक्ष कर- कराधान के पश्चात जब कराघात कहीं अैार होता है एवं करापात कहीं और होता तब कर की ऐसी प्रकृति को  अप्रत्यक्ष कर कहा जाता है। दूसरे शब्दों में अर्थब्यवस्था में कर से सम्बंधित कानून को लागू करने के पश्चात जिस ब्यक्ति के ऊपर अथवा संस्था के ऊपर कर को आरोपित किया जाता है, यदि उस संस्था के द्वारा अथवा उस ब्यक्ति के द्वारा कर के भार का सहन न कर के किसी अन्य ब्यक्ति अथवा संस्था के द्वारा वहन कर लिया जाता है। तब ऐसे ही कर को अप्रत्यक्ष कर कहा जाता है। अप्रत्यक्ष कर के उदाहरण हैं- उत्पाद शुल्क, सीमा षुल्क, प्रति संतुलनकारी शुल्क, सेवा कर, बिक्री कर, मनोरंजनकर, चुंगी इत्यादि।
उत्पाद शुल्क- अर्थब्यवस्था के अंतर्गत सरकार के द्वारा उत्पादन के समय उपलब्ध कराई गयी सुविधाओं के बदले आरोपित किया जाने वाला शुल्क उत्पाद शुल्क कहलाता है। 
सीमा शुल्क- सीमा शुल्क आयात शुल्क एवं निर्यात शुल्क का सम्मिलित स्वरूप होता है। वस्तुओं एवं सेवाओं के आयात एवं निर्यात के समय उपलब्ध कराई गयी सुविधाओं के बदले आरोपित किया गया शुल्क सीमा शुल्क कहलाता है। केन्द्र सरकार के करों के दृष्टिकोण से सीमा शुल्क भारत का ही नहीं अपितु संसार का सर्वाधिक प्राचीन शुल्क है। जबकि सम्पूर्ण करों की दृष्टिकोण से संसार का सर्वाधिक प्राचीन शुल्क भूराजस्व है।
सेवा कर- अर्थब्यवस्था में सेवाओं के उत्पादन के समय आरोपित किया जाने वाला कर सेवा कर कहलाता है। 

कर से सम्बंधित कुछ महत्वपूर्ण तथ्यः

  • अप्रत्यक्ष कर एवं प्रत्यक्ष कर के दृष्टि से केन्द्र सरकार को सर्वाधिक राजस्व अप्रत्यक्ष कर से प्राप्त होता है। 
  • अप्रत्यक्ष कर की दृंिष्ट से केन्द्र सरकार को सर्वाधिक राजस्व उत्पाद शुल्क से प्राप्त होता है।
  • अप्रत्यक्षकर की दृष्टि से केन्द्र सरकार को सर्वाधिक शुद्ध राजस्व सीमा शुल्क से प्राप्त होता है।
  • प्रत्यक्ष कर की दृष्टि से केन्द्र सरकार को सर्वाधिक राजस्व निगम कर से प्राप्त होता है।
  • भारत के संविधान में कर से सम्बंधित प्रावधान सातवीं अनुसूची में वर्णित है। 
  • भारत के संविधान में कर सम्बंधित प्रावधान अनुच्छेद 263 से लेकर अनुच्छेद 300 तक वर्णित है। 
  • एल.के. झा समीति का सम्बंध अप्रत्यक्ष कर से है।
  • रेखीय समीति का सम्बंध अप्रत्यक्ष कर से है। 
  • वांचू समीति का सम्बंध प्रत्यक्षकर से है। 
  • चेलैय्या समीति का सम्बंध कर संरचना में परिवर्तन से है। चलैय्या समीति ने करों की दरों को हटाने की सिफारिष प्रस्तुत की है। चेलैय्या समीति की सिफारिष पर भारतीय अर्थब्यवस्था में सेवा कर को लागू किया गया।
  • भारत की पहली कर मुक्त फिल्म झनक नक पायल बाजे है। इस फिल्म के निर्देषक वी. सान्ताराम हैं। 
  • स्थाई लेखा संख्या का सम्बंध आयकर से है।
  • केलकर समीति का सम्बंध प्रत्यक्षकर एवं अप्रत्यक्षकर दोनों से है। केलकर समीति ने कृषि से प्राप्त आय पर भी कर लगाने की सिफारिष प्रस्तुत की थी।
  • आॅपरेषन जेंटल मैन का सम्बंध आयकर विभाग के द्वारा क्रिकेट खिलाड़ियों के ऊपर की गयी छापे की कार्यवाई से है।
  • केन्द्रिय करों से प्राप्त राजस्व का वितरण वित्त आयोग की सिफारिष के अनुसार केन्द्र सरकार एवं राज्य सरकार के बीच कर दिया जाता है। परंतु निगमकर एवं सीमाषुल्क से प्राप्त राजस्व का वितरण नहीं किया जाता है। दूसरे शब्दों में निगम कर एवं सीमाषुल्क से प्राप्त राजस्व का वितरण राज्य व केन्द्र के बीच नहीं किया जाता है। 
वित्त आयोगः- वित्त आयोग का गठन संविधान के अनुच्छेद 280 के अनुसार भारत का राष्ट्रपति प्रति पाॅंच वर्ष पर अथवा आवष्यकता पड़ने पर करता है। वित्त आयोग में सदस्यों की कुल संख्या अध्यक्ष सहित पाॅंच होती है। वित्त आयोग का मुख्य कार्य केन्द्रिय करों से प्राप्त राजस्व का वितरण केन्द्र सरकार एवं राज्य सरकार के बीच करना होता है। 
गुलाबी अर्थब्यवस्था- भारतीय अर्थब्यवस्था के संदर्भ में आर्थिक विकास दर आषा के अनुकूल पाये जाने पर इसे गुलाबी अर्थब्यवस्था के नाम से जाना जाता है। 
प्रति संतुलन कारी शुल्कः- अंतर्राष्ट्रीय ब्यापार के संदर्भ में आयातित वस्तुओं के उपभोग को हतोत्साहित करने के लिए डंपिंग के प्रतिक्रिया के परिणाम स्वरूप जो शुल्क आरोपित किया जाता है। प्रतिसंतुलनकारी शुल्क कहा जाता है। वस्तुतः जब कोई देष अपने देष मेें उत्पादित वस्तुओं को दूसरे देषों में उत्पादन लागत से कम लागत पर बेचना प्रारम्भ कर देता है तब इसे ही डंपिंग कहा जाता है। 

  • स्वाधीनता के समय अंतर्राष्ट्रीय ब्यापार में भारत की हिस्सेदारी 2 प्रतिषत थी। किन्तु कालांतर में चलकर अंतर्राष्ट्रीय ब्यापार में भारत की हिस्सेदारी कम होकर 1 प्रतिषत पर आ गयी है। अंतर्राष्ट्रीय ब्यापार में हिस्सेदारी को बढ़ाने के लिए एवं उत्पाद शुल्क की परम्परागत प्रणाली में ब्याप्त दोष को दूर करने के लिए एल.के.झा समीति के सिफारिष पर भारतीय अर्थब्यवस्था में उत्पादषुल्क के आधुनिक प्रणाली अथवा मूल्यवर्धित कर प्रणाली अर्थात वैल्यू एडेड टैक्स ;ट।ज्द्ध को अपनाया गया। 
      उत्पाद षुल्क की परम्परागत प्रणाली के अन्तर्गत उत्पादन के प्रत्येक चरण पर शुल्क आरोपित किया जाता रहा जिसका परिणाम यह हुआ कि उत्पाद शुल्क का कुल मूल्य अधिक हो गया । उत्पाद शुल्क का कुल मूल्य अधिक होने से भारतीय अर्थब्यवस्था में उत्पादित वस्तुओं की लागत बढ़ गयी। वस्तुओं की लागत में इस बृद्धि के कारण अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में भारतीय अर्थब्यवस्था ने उत्पादित वस्तुओं से प्रतियोगित नहीं कर पायी जिसका परिणाम यह हुआ कि अन्तर्राष्ट्रीय ब्यापार में भारत की हिस्सेदारी निरन्तर कम होती चली गयी मूल्य वर्धित कर प्रणाली के अंतर्गत उत्पादषुल्क उत्पादन के प्रत्येक चरण पर आरोपित न करके उपयोगिता में कुल हुई बृद्धि के ऊपर आरोपित किया जाता है। इसलिए उत्पाद शुल्क का कुल मूल्य बहुत ही कम आता है। शुल्क का मूल्य कम होने से भारतीय अर्थब्यवस्था में उत्पादित वस्तुओं की कीमतें कम हो जाती हंै, क्योंकि उत्पादन लागत में कमी आ जाती है। उत्पादन लागत में इस कमी के कारण अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में भारतीय अर्थब्यवस्था में उत्पादित वस्तुएं प्रतियोगिता करने में सक्षम हो गयी। जिसका परिणाम यह हुआ कि अन्तर्राष्ट्रीय ब्यापार में भारत की हिस्सेदारी जो कभी 0.1 प्रतिषत पर थी, वर्तमान समय में 0.8 प्रतिषत पर आ चुकी है। इसी कारण मूल्यवर्धित कर प्रणाली को भारतीय अर्थब्यवस्था में अपना लिया गया। 
     भारतीय अर्थब्यवस्था में वैट  को सर्वप्रथम विनिर्मित वस्तुओं के ऊपर लागू किया गया। विनिर्मीत वस्तुओं के ऊपर लागू करने के पश्चात यहां पर इसे मानवैट ;ड।छट।ज्द्ध कहा गया । विनिर्मित वस्तुओं के ऊपर यह प्रयोग सफल रहा। इसलिए इसका और अधिक विस्तार किया गया। विस्तार के पश्चात यहां पर इसे मोडवैट ;डव्क्ट।ज्द्ध कहा गया। भारतीय अर्थब्यवस्था में कुछ समय पूर्व तक उत्पाद शुल्क की तीन दरें यथा कुछ वस्तुओं पर 8 प्रतिषत की दर से कुछ वस्तुओं पर 16 प्रतिषत की दर से एवं शेष वस्तुओं के ऊपर 24 प्रतिषत की दर से उत्पाद शुल्क लागू किया जा रहा था। किन्तु वर्तमान समय में तीनों दरों को आपस में मिलाकर एकमात्र दर 16 प्रतिषत निर्धारित कर दिया गया है। दूसरे शब्दों में जिन वस्तुओं के ऊपर 8 प्रतिषत की दर से उत्पाद शुल्क लागू किया जा रहा था, उन वस्तुओं के ऊपर 16 प्रतिषत की दर से उत्पादषुल्क लागू किया जाने लगा जिन वस्तुओं के ऊपर 16 प्रतिषत की दर से उत्पाद शुल्क लागू किया जा रहा था उन वस्तुओं के ऊपर 16 प्रतिषत के इस दर को बनाये रखा गया, किंतु जिन वस्तुओं के ऊपर 24 प्रतिषत की दर से उत्पाद शुल्क लागू किया जा रहा था उन वस्तुओं के ऊपर उत्पाद शुल्क की दर को कम करके 16 प्रतिषत कर दिया गया तीनों दरों का केन्द्रीयकरण करने के बाद यहां पर इसे केन्द्रीयकृत मूल्यवर्धित कर प्रणाली या सेनवैट कहा गया।
        
आयकर लगाने की प्रणालीः- आयकर लगाने की निम्न प्रणाली प्रचलन में रही है.........
1. समानुपातिक प्रणाली
2. प्रगतिषील प्रणाली 
3. प्रतिगामी प्रणाली
4. अधोगामी प्रणाली
समानुपातिक प्रणालीः- इस तरह की कर प्रणाली में आय के स्तरों में बृद्धि होने पर भी करों की दरों में कोई भी परिवर्तन नहीं किया जाता है। उदाहरण के लिए श्
  आय का स्तर कर की दर
5000.00                      5 प्रतिषत
10000.00                     5 प्रतिषत
15000.00                     5 प्रतिषत
प्रगतिषील प्रणालीः- इस तरह की कर प्रणाली में जैसे-जैसे आय के स्तरों में बृद्धि होती है, करों के दरों में बृद्धि कर दी जाती है। उदाहरण के लिए...........
आय का स्तर                      कर की दर
5000.0 5 प्रतिषत
10000.00                      15 प्रतिषत
15000.00                      25 प्रतिषत
प्रतिगामी प्रणालीः- इस तरह की कर प्रणाली में जैसेश्जैसे आय के स्तरों में बृद्धि होती जाती है, वैसेश्वैसे करों की दरों में बृद्धि कर दी जाती है। उदाहरण के लिए............
आय का स्तर                      कर की दर
 5000.00                        25 प्रतिषत
 10000.00                       15 प्रतिषत
 15000.00                        5 प्रतिषत
अधोगामी प्रणालीः- यह कर प्रणाली प्रगतिषील कर प्रणाली एवं समानुपातिक कर प्रणाली का सम्मिलित रूप होती है। इस तरह के भी कर प्रणाली में आय के स्तरों में बृद्धि के साथ साथ करों के दरों में बृद्धि कर दी जाती है, किन्तु एक निष्चित आय के स्तर के पश्चात आय में बृद्धि होने पर भी करों की दरों में कोई भी परिवर्तन नहीं किया जाता है। उदाहरण के लिए................
आय का स्तर                        कर की दर
  5000.00                        5 प्रतिषत
 10000.00                        15 प्रतिषत
 15000.00                        25 प्रतिषत
 20000.00                        25 प्रतिषत
 25000.00                        25 प्रतिषत
    भारतीय अर्थब्यवस्था में आय पर कर लगााने की प्रगतिषील कर प्रणाली ही प्रचलन में है। 
अधिभार:- राष्ट्रीय आपदा एवं विपदा के समय कुल हुए नुकसान की भरपाई हेतु जब सरकार के द्वारा कर के अतिरिक्त कर आरोपित किया जाता है तब इसे ही अधिभार कहा जाता है। दूसरे शब्दों में अधिभार विषिष्ट उद्देष्यों के तहत आरोपित किया जाता है। उदाहरण के लिए गुजरात में आये हुए भूकम्प के कारण कुल हुए नुकसान की भरपाई केन्द्र सरकार ने अधिभार को आरोपित करके पूरा किया था। 
टोबिन कर:- अंतराष्ट्रीय मुद्रा बाजार के सम्बंध में देषों की मुद्राओं के बीच विनिमय के समय प्रसिद्ध अर्थषास्त्री टोबिन ने कर लगाने का सुझाव प्रस्तुत किया था इन्हीं के नाम पर मुद्राओं के विनिमय के समय आरोपित किया जाने वाला कर टोबिन कर कहलाता है। टोबिनन कर की अवधारणा अभी प्रस्तावित है। 
फ्रिंज बेनेफिट टैक्स अथवा अतिरिक्त लाभ कर:- सीमांत लाभ कर अथवा फ्रिंज बेनेफिट टैक्स बजट 2005-06 में लागू किया गया कंपनियों के द्वारा कर्मचारियों को दी जाने वाली अतिरिक्त सुविधाओं के ऊपर जो कर आरोपित किया जाता है सीमांत लाभ कर कहा जाता है। 
आदान प्रदान करः- अर्थब्यवस्था के पूंजी बाजार में शेयर के खरीद एवं बिक्री के समय आरोपित किये जाने वाला कर आदान प्रदान कर कहलाता है। 
पेग्विन कर:- इस तरह का कर अर्थब्यवस्था के अंतर्गत ऐसी संस्थाओं के ऊपर आरोपित किया जाता है जो पर्यावरण को क्षति पहुॅंचाती हंै। 
बिक्री कर:- यह अप्रत्यक्ष कर का उदाहरण है। यह कर राज्य सरकार के द्वारा आरोपित किया जाता है। राज्य की सीमा के अंतर्गत वस्तुओं के विक्रय के समय आरोपित किया जाने वाला कर विक्री कर कहलाता है। विक्री कर को आरोपित करने वाला पहला राज्य मध्यप्रदेष राज्य है। मध्य प्रदेष सरकार के द्वारा सर्वप्रथम पेट्रोलियम पदार्थेां के ऊपर बिक्री कर को आरोपित किया गया था इसलिए बिक्री कर का एक अन्य नाम पेट्रोल कर भी है। वर्तमान समय में बिक्री कर के नाम को बदल कर ब्यापार कर कर दिया गया है। राज्य सरकार को सबसे अधिक राजस्व बिक्री कर से प्राप्त होता है, तत्पष्चात राज्य सरकार को सबसे अधिक राजस्व आबकारी शुल्क से प्राप्त होता है। वस्तुतः राज्य की सीमा के अंतर्गत सामाजिक कल्याण को क्षति पहुॅंचाने वाली वस्तुओं के उत्पादन के ऊपर आरोपित कर आबकारी शुल्क कहलाता है। आबकारी शुल्क को राज्य उत्पाद शुल्क के नाम से भी सम्बोधित किया जाता है। 
मनोरंजन कर:- यह अप्रत्यक्ष कर का उदाहरण है। यह कर भी राज्य सरकार के द्वारा आरोपित किया जाता है। राज्य की सीमा के अंतर्गत मनोरंजन सम्बंधी सुविधा जैसे- सिनेमा, सर्कष इत्यादि को उपलब्ध कराते समय आरोपित किया जाने वाला कर मनोरंजन कर कहलाता है। मनोरंजन कर को आरोपित करने वाला पहला राज्य पष्चिम बंगाल है। 
प्रवेष कर:- प्रवेष कर अप्रत्यक्ष कर का उदाहरण है । यह कर भी राज्य सरकार के द्वारा आरोपित किया जाता है। राज्यों के सीमा पारगमन के समय आरोपित किया जाने वाला कर प्रवेष कर कहलाता है। 
सीमांत कर:- यह अप्रत्यक्ष कर का उदाहरण है। यह जनपद की सीमा पारगमन के समय आरोपित किया जाता है। 
चुंगी:- यह कर भी अप्रत्यक्ष कर का उदाहरण है। जब स्थानिय प्रषासन के द्वारा जनपद के अंतर्गत वस्तुओं के विक्रय के लिए स्थान केा उपलब्ध कराने के बदले जो कर आरोपित किया जाता है चुंगी कहलाता है। 
     विष्व अर्थब्यवस्था के संदर्भ में मूल्य वर्धित कर प्रणाली अर्थात वैट सिस्टम केा लागू करने वाला पहला देष फ्रांस है। जबकि भारत में वैट को लागू करने वाला पहला राज्य हरियाण राज्य है।
(Manoj Bind)


Wednesday, November 19, 2014

हजार एक की मां

(Manoj bind)
काल के कठोर थपेड़ों से आहत उम्र के अंतिम दहलीज पर पेट अपने अस्तित्व को पीठ के हवाले कर चुका था। चेहरे पर पड़ी गहरी काली झुर्रियां असंख्य रेखाओं के रूप में मानों अतीत के कठोर इतिहास को लिपिबद्ध किए हुए है। दुर से देखने में यह चेहरा ऐसा प्रतीत हो रहा था मानों किसी ने गंदे काले मटमैले जल के सरोवर में कंकड़ फेंक दिया हो। फलस्वरूप उस जल में झुर्रियों के रूप में तरंगें उठ रही हैं। इसी के मध्य मुरझाए हुए कमल के सदृष्य दोनों आंखें हर किसी से कुछ कहने का प्रयास कर रही हैं। माथे की रेखाएं गहरी पड़ गयी थी। पैर इस तरह से फटा था मानों किसी ताल की काली मिट्टी में दरार पड़ी हो। रह-रहकर उसमें से रक्त ऐसे बह जाता मानो मिट्टी की इन दरारों से लाल जल का सोता फुट गया हो।
समाज व परिवार से तिरस्कृत, बहिस्कृत, शोषित फटे पुराने गुदड़ी में लिपटी हुई यह औरत सदृश्य काया मेरे कालेज के गेट पर एक बड़ा सा जस्ते का कटोरा लिए थी जो कि कई जगह से पिचक गया था, जिसका उपयोग वह खाने और पानी पीने में भी किया करती थी, लेकर बैठी थी। उसके इस भौतिक स्वरूप को लोग भिखारिन की संज्ञा देकर उसके प्रति संज्ञा शून्य हो जाते थे। 
मैं जैसे ही कालेज के गेट पर पहुॅंचता उसे देखकर रूक जाता। कुछ पल उसे ध्यान से देखता और उसके सुस्त पड़ चुके हृदय में छिपे दुखों के समुंदर में गोते लगाकर विषाद रत्न ढंुढने का प्रयास करता, कि तभी मेरे कानों में दुख भरी एक नमकीन लहर घुल जाती। 
बेटाऽऽ.......कुछ दे दो बेटाऽऽ.........भगवान तुम्हें लम्बी उमर देगा। कुछ दे दो बेटाऽऽऽ......।
तार्किकता और बौद्धिकता के परिवेश से प्रभावित मेरा मन कभी भी इस दर्द भरी आवाज की ब्याख्या भावनात्मक स्तर से नहीं किया था। करता भी कैसे हर तथ्य को तार्किक और बौद्धिक ढंग से कहने और समझने की आदत सी जो पड़ गयी थी। तर्क के भंवर में फंसकर भावना अपने अस्तित्व को बचाने के लिए संघर्ष करती। सोचता कि जो बुढि़या मेरे लिए ऐसी दुवाएं कर रही है यदि उसकी दुआवों में प्रभाव होता तो वह अपने लिए भगवान से कुछ क्यों नही मांग लेती। शायद मैं यह भूल गया था कि दुवाओं का प्रभाव प्रत्यक्ष नहीं होता और यह भी भूल गया था कि जब दुखों के बादल घिरते हैं तो श्रद्धा और विश्वास का धरातल भी कीचड़ बन जाता है। ऐसे में दुवाओं का प्रभाव भला कैसे होता। 
अब उसकी बात को मैं वहीं अचेतना के सीवर में डालकर आगे बढ़ लेता। यह दर्द भरी आवाज बिल्कुल हुबहू मुझे तब भी सुनाई पड़ती जब मैं गेट से बाहर निकलता। मैं क्या कालेज में लगभग एक हजार से अधिक छात्र थेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेे। लगभग सबके साथ यह घटना घटती। कोई भी गेट से प्रवेश करे या बाहर जाये सबको आशा भरी निगाह से देखती और वेदना भरी आवाज में टेपरिकार्ड की तरह बजती रहती-
भगवान के नाम पर कुछ दे दो बेटा .......भगवान तुम्हें लम्बी उमर देगा.........। शायद लम्बी उमर मांगने के अलावा उसे दुवाओं का कोई दुसरा जुमला आता ही नहीं था।
एक दिन जब मैं घर जाने के लिए अपनी उम्रदराज साइकिल को लेकर गेट पर पहुॅचा तो ठिठककर रूक गया। जो बुढिया रोज बैठी रहती थी वह आज लेटी हुई थी। उसके कपड़े अस्त-ब्यस्त पड़े थे। जस्ते का पिचका हुआ कटोरा दुर पड़ा था। मुख से निकलने वाली दर्दभरी आवाज मेरे हृदय को हजारों टुकड़े करती हुई वायुमण्डल में विलुप्त हो जाती।
बेटवाऽऽऽ.................मुन्नाऽऽऽ.............भइयाऽऽऽ.........मेरे लाल बहुत भूख लगी है मेरे लाल............यह आवाज उसके जिह््वा से नही बल्कि उसके पीठ में छुप चुके पेट की अतृप्ति दीवारों को रगड़कर आ रही थी और मेरे तार्किकता के भंवर के वेग को मंद कर रही थीं, उसमें फंसी भावना अश्रुपूरित नेत्रों से भंवर के बाहर आ गयी थी। मैं चाहकर भी आगे न बढ़ सका। साइकिल को दीवार से सटाकर खड़ाकर बिल्कुल वहां जाकर खड़ा हुआ जहां से इस आवाज की वेदनात्मक संवेदना निकलकर मेरे कानों में घुल रही थी।
वह महिला (बृद्धा) भी अपनी आंखों को बंद किए हुए कराहते हुए एक ही लय में पीड़ा की पराकाष्ठा को झेलते हुए कहे जा रही है-
बेटवाऽऽ..........भइया...........मुन्ना............मेरे लाल.........बहुत भूख लगी है बेटाऽऽ.........।
मैं सोचा रोज भगवान के नाम पर मांगने वाली आज भगवान को भुल गयी है। क्या भगवान पर से इसका बचा-खुचा विश्वास भी खत्म हो गया ? नहीं-नहीं ऐसा नहीं हो सकता। ईश्वर का अस्तित्व तो हर समय अपने एक ही रूप में रहा है। हमने उसके प्रति जैसी श्रद्धा जैसा विश्वास दिखाया उसका प्रतिफल हमें वैसा ही मिला। हमने जैसा कर्म किया हमें उसका प्रतिफल वैसा मिला। परंतु इस बुढिया ने किसी का भला क्या............तभी उसकी दर्द भरी आवाज ने मेरे इस मस्तिष्क द्वण्द को बीच में ही विराम लगा दिया। 
आधा कंकाल बन चुकी इस शरीर से प्रस्फुटित एक शब्द मेरे मस्तिष्क में अब बवंडर की तरह चक्कर मारते हुए कौंधने लगा। हालांकि इससे पहले भी मैं इस शब्द को सुन चुका था परंतु पहले ऐसी संवेदनात्मक अनुभूति मुझे कभी नहीं हुई थी। वह शब्द था “बेटा”। जो किसी मां के मुख से नहीं बल्कि उसके उस पेट से, उस कोख से निकलता है जिसमें रखकर मां अपने बच्चे की हिफाजत और उसका पोषण करती है। परंतु हाय रे विधि की विडम्बना आज एक मां सुरक्षा की कल्पना से परे भूख से तड़प रही है। लगा कि मुझे मेरी मां बुला रही है। हां मां ही तो थी तभी तो उसने मुझे बेटा कहा, मुझे ही क्यों वह पुरे विद्यालय को कुटुम्ब के रूप में देखती। सबको बेटा या बेटी कहती तो मेरी ही क्यों ? वह तो हजार एक की माॅं है। तो फिर इन हजारों में से अब तक किसी एक ने भी उसके दर्द भरी आवाज को क्यों नहीं महसूस किया। क्या उसके इन हजारों बेटों में से एक भी लायक नहीं है। क्या प्रकृति इतनी निष्ठुर हो गयी है। 
नहीं-नहीं मैं जो हूं। मैं पुत्र के दायित्व को निभाउंगा। मैं मां को उसका हक दूंगा। मैं अपने आपको रोक नहीं पाया। हाथ में ली हुई पुस्तक एक तरफ रखकर मां के चेहरे पर झुककर घुटने के बल बैठ गया। अपने दाहिने हाथ को मां के माथे पर रखा, ऐसा लगा जैसे मैंने अपने हाथ को किसी गर्म तावे पर रख दिया हो। बुखार से पुरा शरीर जल रहा था। 
मेरे हाथों के स्पर्स से उसने आॅंखें खोली तो ऐसा लगा जैसे किसी तरंगित गंदे सरोवर में मुरझाये हुए दो लाल कमल कहीं से एकाएक खिल गये हों। चेहरे की झुर्रियां गहरी पड़ गयी, जबड़े की मांसपेशियों में कसाव आया, सूख चुके होंठों में कम्पन हुआ, थकी हुई जिह्वा को गति मिली-
’कौनऽऽन.........कौन है बेटा।‘
’मैं हूं मां, तुम्हारा बेटा।‘
’मेरा बेटा ! अरे हां मेरे तो बहुत सारे बेटे हैं।‘ उठने का प्रयास करते हुए।
’तुम पहली बार मेरे पास आए हो न। जरा तुम्हें अच्छी तरह देख लूं।‘
’रूको मां मैं तुम्हें उठाता हूं।‘ बैठाकर मैने मां के सिर को अपने बाजुओं के सहारे टिका कर बैठ गया। 
मां के बेजान से खुरदुरे हाथ मेरे गालों पर जाकर फिसलने लगे। उस समय मां की पथराई आॅंखों से निकलने वाले निश्छल प्रेम के आॅंसू की गर्माहट शायद प्रेम की चरम पराकाष्ठा की सोदाहरण ब्याख्या कर रहे थे। ऐसा प्रेम जो किसी दीवार किसी बंधन की सीमा के परे होता है। मां ने खरखराते हुए गले से कहा-
’बेटा मुझे विश्वास था कि एक दिन मेरा कोई न कोई बेटा मेरी कराह जरूर सुनेगा और मुझे मां कहेगा।‘
गेट से होकर जितने भी लड़के जाते सब मुझे इस तरह से बुढि़या जिन्हें वे भिखारिन कहते से लिपटा देखकर आश्चर्य से मुझे देखने लगते। मां उनकी तरफ निगाह उठाती और धीरे से कहती-
’देखो बेटा वह भी मेरा बेेटा है।‘
’हां माॅं! वही क्यों इधर देखो ये सब भी तो तुम्हारे ही बेटे हैं।‘ मैंने बगल में पान गुटके की दुकान की ओर इशारा करते हुए कहा। और आगे भी बोला-
’ये सब तो तुम्हारे हीे बेटे हैं न मां जो सैकड़ो रूपये पान गुटके पर फुंककर अपने शरीर अपनी आत्मा को जला रहे हैं। काश ! उसी में से एक रूपया भी आज तुम्हें मिल गया होता तो मां आज तुम्हारी यह हालत न होती।‘
’परंतु मुझे अपने इन बच्चों से कोई शिकायत नहीं है।‘ मां ने अत्यंत शालीनता के साथ यह कहा।‘
’यही तो मां की महानता है। पुत्र कितना ही कुपूत्र क्यों न हो जाये मां के लिए वह पुत्र ही रहता है।‘
’अच्छा मां तुम्हें भूख लगी है न चलो तुम्हें खाना खिलाऊॅं.........परंतु तुम्हें तो बहुत तेज बुखार है मां। चलो पहले तुम्हें दवा दिलाते हैं।‘
मां को वहां से ले जाने के लिए मुझे किसी की मदद की आवश्यकता थी। वैसे कोई भी इस काम में मेेरी मदद नहीं करता। इस लिए मैंने अपने सुख-दुख के साथी, अपने सबसे अच्छे दोस्त गीता को बुलाया। वह मुझे अजीब तरह से देखते हुए माथे को सिकोड़ते हुए बोेेेली-
’क्या है मनोज ? ये क्या कर रहे हो ?‘
’गीता प्लीज मेरी मदद करो । मां को उठाकर उस क्लीनिक तक ले चलना है। बहुत तेज बुखर है मां को।‘ मैंने अत्यंत निवेदन के साथ यह कहा था। परंतु वह अत्यंत आश्चर्य मिश्रित आवाज में भौहों को सिकोड़ते हुए बोली-
’क्याऽऽ.........ये तुम्हारी मां है ? ये तो भिखारिन है मनोज।‘
मैं अपने जज्बातों को रोक नहीं पाया और फुट पड़ा-
’तुमने क्या कहा दोस्त कि ये भिखारिन है ? मैं तुमसे पुछता हुं कि क्याऽऽ......मेरी मां भिखारिन हो सकती है ? तुम्हारी माॅं भिखारिन हो सकती है या हममें से किसी की मां भिाखारिन हो सकती है ? यदि हां तो सचमुच यह भिखारिन ही हमारी मां है गीता। क्या इसने कभी तुम्हें बेटी नहीं कहा या मुझे बेटा नहीं कहा ?‘
’कहा है मनोज।‘ गीता ने अत्यंत शालीनता के साथ उत्तर दिया। 
’तो बताओ दोस्त जिस भाव से तुम्हारी माॅं तुम्हें बेटी और मेरी माॅं मुझे बेटा कहती है यदि उसी भाव से इसने हमें बेटी और बेटा कहा तो आखिर क्या अंतर है उस माॅं और इस माॅं में, बोलो दोस्त।‘ कहते-कहते मेरा गला भर आया था। गीता भी भावुक होकर मुझे देखने लगी और धीरे से बोली-
’आइ एम साॅरी मनोज। मुझे माफ कर दो। मैं तुम्हारी भावनाओं को समझ नहीं सकी। चलो उठाओ माॅं को हम इन्हें क्लीनिक ले चलते हैं।‘
हम दोनों दोस्त माॅं को क्लीनिक ले जाकर उसकी दवा करायें। चूंकि गीता का घर वहीं क्लीनिक के पास में ही था अतः बिना किसकी परेशानी के वह माॅं की निश्छल भाव से लगन के साथ सेवा की। उसकी सेवा का ही फल था कि माॅं जो कि गले में कफ बढ़ जाने के कारण बोल नहीं पा रही थी, अब बोलने लगी थी। गीता अपने घर से माॅं के लिए नियमित खाना लाती और अपने हाथों से खिलाती। माॅं की तबीयत अब बिल्कुल ठीक थी। फिर भी डाक्टर ने एक दिन आौर रूकने को कहा था। 
आज माॅं हम दोनों के सामने बैठकर अपने हााथ से भरपेट भोजन की। माॅं के चेहरे पर संतुष्टि के भाव देखकर हम दोनों के चेहरे पर भी संतुष्टि के भाव उभर आये। खाते-खाते माॅं के आॅंखों से आंसू छलक आये। संवेदना की सरिता भावुकता के सरोवर से बह निकली। होठों पर जैसे भूकम्प आ गया हो। 
’क्या हुआ माॅं ?‘ गीता माॅं की दशा देखकर बोल पड़ी थी। 
’कुछ नहीं मेरे बच्चों। बस यूं ही मन भर आया, न जाने किस जन्म का तुम्हारा हमारा नाता है जो तुम लोग मेरी इतनी................
’अरे माॅं तुम भी, अरे तुम्हारा हमारा नाता किसकी और जन्म का नहीं माॅं बल्कि इसी जन्म का तो है। आखिर तुम्हीं तो हमें बेटी और बेटा कहती हो न।‘ गीता मां के आंसू पोंछते हुए बोली थी। 
’खा लो माॅं कल तुम्हें यहाॅं से छुट्टी मिल जायेगी।‘
’अच्छा माॅं अब हम लोग चलेंगे।‘
आते वक्त हम दोनों माॅं के पैर छुने लगे तो माॅं बोल पड़ी-
’जुग-जुग जिओ मेरे बच्चों मेरी भी उमर तुम लोगों को लग जाय।‘
दुसरे दिन सुबह जल्दी-जल्दी तैयार होकर विद्यालय की कुछ पुस्तकें लिया और साइकिल उठाकर सबसे पहले गीता के घर गया। वहाॅं से उसको लिया आौर साथ में टिफिन भी पैक किया फिर हम दोनों क्लीनिक पर पहुॅंचे। डाक्टर ने डिसचार्ज बिल बनायी और हमें डिसचार्ज कार्ड दे दिया। हम दोनों तिव्र कदमों से माॅं के बेड के पास पहुॅंचे। शायद माॅं सो रही थी। हमने धीरे से माॅं को जगाने का प्रयास किया। परंतु माॅं के शरीर में कहीं जरा भी हरकत नहीं हुई। मेरा मन किसकी अनिष्ट की आशंका से घबरा गया। तुरंत डाक्टर को बुलाया। डाक्टर ने हर तरह से चेक किया। फिर भारी मन से बोला-
’आइ एम साॅरी...........‘
‘नहीं-नहीं डाक्टर साहब ऐसा नहीं हो सकता। वह हमें छोड़कर नहीं जा सकती। वह सिर्फ हम दोनों की नहीं हमारे जैसे हजारों की माॅं थी। वह अपने हजारों बच्चों को छोड़कर ऐसे नहीं जा सकती। हमारी माॅ जिंदा है न डाक्टर साहब ?‘
’आइ एम सो साॅरी मि. मनोज। सी डेड।‘ 
’क्या..............................‘
गीता का रो-रोकर बुरा हाल हो रहा था। मैंने उसे समझाया-
’चलो उठो गीता, लगता है माॅं की दुआएं हमें लग गयी। उसी ने तो कल कहा था- मेरे बच्चों मेरी भी उमर तुम्हें लग जाये।‘ 
यह सुन गीता की आॅंखें शून्य में न जाने कहाॅं खो गयी। मैं भी शुन्य में तलाशने लगा। शायद कहीं...............
                                                                                            

                                                                                        

प्रमुख क्रांतियां एक दृष्टि में

(Manoj Bind)
भारतीय अर्थब्यवस्था से जुड़ी प्रमुख क्रांतियां एक दृष्टि मेंः
हरित क्रांति- भारतीय अर्थब्यवस्था में योजना अवकाष की समयावधि में खाद्यान्न उत्पादन से सम्बंधित जिस कार्यक्रम को प्रारम्भ किया गया विलियम गाॅड ने इसे ही हरितक्रंाति शब्द से संबोधित किया। विष्व अर्थब्यवस्था के संदर्भ में हरितक्रांति के जन्मदाता नार्मन ई. बोरलाॅग को माना जाता है। जबकि भारतीय हारित क्रा्रांति का जन्मदाता एम. एस. स्वामीनाथन को माना जाता है। भारतीय अर्थब्यवस्था में हरित क्रांति के फलस्वरूप गेहूॅं के उत्पादन में अत्यधिक बृद्धि दर्ज की गई। चावल का उत्पादन लगभग स्थिर बना रहा। जबकि मोटे अनाजों के उत्पादन में कमी आयी । ध्यान देने योग्य बात यह है कि मोटे अनाजों में ज्वार, बाजरा इत्यादि को सम्मिलित किया जाना है।
स्वेतक्रांति अथवा धवल क्रांति- श्वेत क्रांति का प्रारम्भ 1970 ई. में किया गया जबकि श्वेतक्रांति का जन्मदाता वर्गिज कुरियन हैं। एक विषेष तथ्य यह है कि दुग्ध उत्पादन में भारत का स्थान प्रथम है, जबकि दूध से बने पदार्थों जैसेश् पनीर, मक्खन, घी, इत्यादि के उत्पादन में डेनमार्क का स्थान प्रथम है।
नीली क्रांति- नीली क्रांति का सम्बंध मछली उत्पादन से है।
गुलाबी क्रांति-गुलाबी क्रांति का सम्बंध झींगा मछली के उत्पादन से है।
भूरी क्रांति- भूरी क्रांति का सम्बंध खाद्य प्रसंस्करण से है। कच्चे पदार्थों को रासायनिक अभिक्रिया के माध्यम से लम्बी समयावधि तक सुरक्षित रखने की प्िरक्रया को खाद्यप्रसंस्करण कहा जाता है। उदहाहरण के लिए डिब्बा बंद भोज्यपदार्थ, फलों से जैम अथवा जेली बनाना।
ग्रीन गोल्ड- ग्रीनगोल्ड क्रांति का सम्बंध चाय के उत्पादन से है।
ग्रे क्रांति- ग्रे क्रांति का सम्ब्ंाध उर्वरक उत्पादन से है।
रजत क्रांति- रजत क्रांति का सम्बंध अण्डे के उत्पादन से है।
स्वर्ण क्रांति- स्वर्ण का्रांति का सम्बंध फलों के उत्पादन से है।
पीली क्रांति- पीली क्रांति का सम्बंध तिलहन उत्पादन से है। पीली क्रांति का सर्वाधिक प्रभाव सरसों उत्पादन पर पड़ा।

काली क्रांति- काली क्रांति का सम्बंध सीरा युक्त पेट्रोलियन पदार्थों के उत्पादन से है।
गोल क्रांति- गोल क्रांति का सम्बंध आलू के उत्पादन से है।
मूक क्रांति- मूक क्रांति का सम्बंध मोटे अनाजों के उत्पादन से है। जबकि राज्यों के संदर्भ में मूक क्रांति का सम्बंध मध्य प्रदेष के तिव्रतम विकास से है।
बादामी क्रांति- बादामी क्रांति का सम्बंध मसालों के उत्पादन एवं मसालों के निर्यात से है।
एन.एच. क्रांति - इस क्रांति का सम्बंध स्वर्णिम चतुर्भुज सड़क परियोजना से है। स्मरणीय तथ्य यह  है कि स्वर्णिम चतुर्भुज सड़क परियोजना का प्रारम्भ राकेष मोहन समिति की सिफारिष पर किया गया।
अमृत क्रांति- अमृत क्रांति का सम्बंध नदियों को आपस में जोड़ने से सम्बंधित परियोजना से है।
सदाबहार क्रांति- सदाबहार क्रांति का सम्बंध जैव तकनीकि के द्वारा कृषि उत्पादन में बृद्धिसे है।
इन्द्रधनुषी क्रांति- इन्द्रधनुषी क्रांति का सम्बंध पहले से चली आ रही क्रांतियों के सम्मिलित स्वरूप  से है।
लाल क्रांति- लाल क्रांति का सम्बंध मांस/टमाटर उत्पादन दोनों से है।
                                               

स्मृति के अधर पर

(मनोज) 

खेतों के अस्थिपंजर के रूप में फैली-बिखरी पतली मोटी मेड़ें एक दूसरे को समकोण, न्यूनकोण व अधिककोण पर छू-छू कर दूर भागती, पुनः आगे किसी दूसरी मेड़ का स्पर्श लेकर विभिन्न दिशाओं में अनुगमन करती सम्पूर्ण सीवान को एक कंकालीय जामा पहना रही है। सीवान के बीचो बीच से गुजरता माइनर मुख्य धमनी उससे जुड़ी छोटी-छोटी नालियां सहायक धमनियों के रूप में बिछी है। माइनर के अगल-बगल दो मोटी-मोटी मेड़ें कशेरूक दण्ड के रूप में सम्पूर्ण सीवान को एक जीवधारी  का स्वरूप प्रदान कर रही है। मेड़ों पर उगी दूब घस व कहीं कहीं पुंज के रूप में कुश व अन्य विभिन्न घासों के पत्त्यिों पर ओस की नन्हीं-नन्हीं सुकुमार बूॅंदें मंद-मंद हवाओं के झोंके से ऐसे हिल रही हैं जैसे माॅं की गोंद में कोई नन्हा अठखेलियाॅं कर रहा हो।
प्ूारब की ओर क्षितिज के पास खून के धब्बे के रूप में छोटे-छोटे बादल के टुकड़े स्पष्ट रूप से किसी के आगमन की पूर्व सूचना दे रहे हैं। पल हर पल जैसे कोई खून के इन धब्बों को किसी अदृश्य हाथ से धूलता सजा रहा हो। दूर क्षितिज के पास स्थित गाॅंव की काली लाल धूंधली छाया के ऊपर एक रक्त वर्ण रोटी के टुकड़े के समान आगंतुक का आगमन हो रहा है। जो क्षण पतिक्षण विभिन्न रूपों का ग्रहण कर रहा है, टुक्का से आधी से क्रमशः पुरी की तरफ अग्रसर। जिसके बढ़ते तेज का प्रभाव स्पष्ट रूप से ओस की नन्हीं-नन्हीं बूॅंदों के तेज पर पड़ रहा है, वे और ऊर्जावान और तेजवान होकर और चमकदार हो रही हैं।
परंतु इन मेड़ों पर बढ़ते दो बुढ़े नंगे पैर, जिनमे ताल की मिट्टी की तरह अनगिनत दरारें पड़ी हैं इन नवजात मासूम बुंदों के अस्तित्व को समाप्त करते चले जा रहे हैं। एक छोटे से चार विस्वा जमीन के टुकड़े केा घेरे हुए लकीर की तरह पतली मेड़ों पर उगी घासों के गोंद में झूलते इन बूंदों के अस्तित्व को समाप्त करने के बाद दोनों पैर थके से खेत मेें ऐसे प्रवेश किए जैसे किसी युद्ध भूमि में किसी बृद्ध किन्तु अनुभवी योद्धा के पैर। परंतु ये पैर किसी रणभूमि के योद्धा के नहीं बल्कि कर्मभूमि के एक बृद्ध योद्धा ”सरन“ के हैं। घुटने से ऊपर मटमैली सिकुड़ी, उसके ऊपर पूरी बांह की बनियान अनगिनत छिद्रों से सुशोभित अपने वास्तविक रंग को त्याग करके शायद अपनी पहचान छुपाने का प्रयास कर रही हैं। चेहरे पर पड़ी झुर्रियों के बीच में दो गम्भीर किंतु मायूस आॅंखें अपने किसी खाई में छुपाने का प्रयास करती। साथ ही सिरपर सफेद उलझे हुए बाल, बेतरतीब दाढ़ी उसके उम्र का प्रमाण पत्र बन चुकी हैं।
सरन ने धीरे से कंधे पर रखी कुदाल को नीचे रखकर पुरे खेत पर एक वृत्तिय दृष्टि घुमाई। कुदाल से थोड़ी मिट्टी खोदी और उसे हाथ में लेकर उसके नमी का निरिक्षण ऐसे कर रहा है जैसे कोई वैज्ञानिक किसी टेस्टट्यूब में कुछ रसायन मिलाकर उसके अनुकूल परिणाम पाने की आशा में एकटक निगाहों को परखनली पर गाड़ दिया हो। मिट्टी को हथेली के सहारे मसलकर मायूस नज़रों से देखते हुए धीरे-धीरे मुक्त करता चला जाता है। एक पल आसमान की तरफ देखा फिर एक आशा भरी निगाह खेत के बगल से निकली नाली पर। इस दौरान उसके चेहरे पर कई तरह के भाव उभरे, फिर विलीन हो गये। कह पाना मुश्किल है कि ऐ भाव आशा के थे, निराशा के, या फिर खुशी के हैं।
सरन लचकती हुई कईन की तरह अपने दांये हाथ को घुटने पर रखकर झुकता है और धीरे-धीरे मेड़ पर बैठ जाता है। कुछ पल के लिए चेहरे पर शकून के भाव उभरे। साथ ही मन मस्तिष्क में कल का चित्र भी उभरने लगा-
बड़ी बहू किस प्रकार से उवससे पेश आयी थी जब उसने अपने पोते को घर के अंदर एक और रोटी लाने को भेजा-
”जाकर कह दे रोटी नहीं है। बुड्ढे को बैठे बैठे सिर्फ रोटी मांगने आता है। न काम के न धंधा के। पता नहीं कब मरेगा बुड्ढ़ा।“
सरन का पोता तो एक माध्यम था। वास्तव में यह बात इतनी तेज कही गयी थी कि वह सुन सके। सरन के लिए यह कोई नई बात नहीं थी। वह तो इतनी कड़वी बात सुनने का आदती था। सो  उसके ऊपर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा लेकिन फिर भी.................
”ले ! ले जाकर दे दे बुड्ढ़े को और कह देना कि दूसरी रोटी नहीं मिलेगी।“
बच्चा हाथ में रोटी लटकाए हिलाते हुए लेकर आया और सरन को देकर बोला-
“बाबा...बाबा माॅं कह रही है कि.......”
“रहने दो बेटा मैं जान रहा हूॅं।”
सरन ने उसके मुॅंह पर अपने बुढ़े हाथ का रखते हुए कहा। और दूसरे हाथ से रोटी लेकर दाल में जो कि कहने को दाल थी परंतु देखने में कोई पीला पानी जैसा था, में सानकर दांत विहिन मंसूढ़ों से ऐसे घोल रहा था जैसे रसगुल्ले का स्वाद अत्यंत आनन्द मग्न होकर ले रहा हो। खाना खाकर सरन उठा और घर के सामने धान के खलिहान में पुआल के ढ़ेर के सहारे बैठ गया और आॅंख मुॅंद कर धूप सेकने लगा। ऐसे वक्त में उसके स्मृति पटल पर अतीत की यादें उभरने लगी थी। 
उसके विवाह के दो साल बाद जब बड़ा लड़का पैदा हुआ था तो कितनी प्रसन्नता हुई थी उसे। पुरे गाॅंव को उसके बरही में भोज दिया था। कथा भी सुना था ठाकुर बाबा की। पहली संतान वह भी लड़का यह तो हर किसी के लिए आनंद दाता होता है। परंतु सरन को तो जैसे दुनिया की सबसे बड़ी खुशी भगवान ने दी थी। 
बड़े लाड्प्यार से पती-पत्नी उसका लालन पालन किए, कोई कसर नहीं छोड़ी थी। सरन उसे आस-पास का हर मेला दिखाने ले जाता। मेले से उसके लिए डमरू, गुब्बारा, बांसुरी, खिलौना, गुड़ की जलेबी और न जाने क्या-क्या चीजें खरीद लाता। इसी दौरान  उसे दूसरी संतान पैदा हुई। यह भी बेटा था। अब धीरे-धीरे बड़े बेटे का लाड्प्यार कम हो गया। बात-बात पर पहले उसके नाराज हो जाने पर सरन गांव की दूकान से चुसनी खरीद कर लाकर दे देता और दुलार कर उसे मनाता। उसके इसी आदत के कारण उसका नाम नखड़ू रखा था। परंतु अब उसके नाराज होकर लोटने-पेाटने पर सरन बजाय उसे कुछदेने के कभी-कभी पीट भी देता था। इस तरह से पितृ प्रेम धीरे-धीरेेेेेेेेेेेेे बड़े पुत्र से छोटे की तरफ प्रवाहित हो रहा था जो कि समाज की एक सामान्य प्रक्रिया है। क्या यह उचित है?........
समय के साथ नखड़ू तथा छोटा बेटा मंगरू बड़े होते गये। आगे सरन की दो संताने और हुई। तिसरी संतान लड़की थी। जो जन्म के दो दिन बाद मर गयी। कहने वाले तो दबी जुबान में यह भी कहते हैं कि यह बच्ची खुद नहीं मरी थी बल्कि मारी गयी थी। नमक चटा दिया था सरन ने। लड़की जन्म बोझ माना जाता है न शायद इसीलिए। सच्चाई क्या है कौन जाने, अगर सरन ने ऐसा किया तो अच्छा नहीं किया। आज लड़कियां भी किसी क्षेत्र में लड़कों से कम नहीं हैं। चैथी संतान के समय सरन की पत्नी की तबियत कुछ ठीक नहीं थी। दो दिन पहले से ही बिचारी दर्द से कराह रही थी। आर्थिक तंगी के कारण सरन उसे अस्पताल भी नहीं ले जा सका। ऐसे में बाहर आग के पास बैठा सरन सिर को दोनों पैरों के बीच में डाले न जाने किस सोच या इंतजार में बैठा था। सोच किस बात की, लड़का होगा कि लड़की। मगर इंतजार किस बात का, बच्चा पैदा होने का या फिर औरत के मर जाने का। यह तो सरन के मन की बात है सो वही जाने। मगर सुबह होते होते औरत की दर्द भरी कराह शांत हो गयी एक दम से। बच्चा पेट में ही मर गया था और माॅं भी। 
सरन अपने दोनों बेटों का लालन-पालन स्वयं माई, बाप बनकर कर रहा था। नखड़ू को स्कूल भेजने लगा, सड़क के किनारे वाले कन्या प्राइमरी पाठशाला में। कहने को तो यह पाठशाला थी परंतु वास्तव में यह आरामशाला थी मुंशी जी की। जो आराम से दोपहर चढ़ने पर आते और बच्चों को श्याम पट पर लिखे वर्णमाला क,ख,ग........को पटरी पर लिखने को कह देते। जो शायद दो महीना पहले लिखा श्याम पट की शोभा बढ़ा रहे थे। किसी बच्चे को, सामान्यतः कक्षा के मानीटर को गिनती पढ़ने को कह खुद स्कूल के पीछे पड़ी नेवार की चारपाई पर गर्मी में ठण्डी हवा और ठण्डी में धूप लेने बैठते और सोते रहते। नींद तब खुलती जब कोई बच्चा शिकायत लेकर जाता कि -
“मुंशीजी-मुंशी जी फला लड़का मेरी दुद्धी चुरा लिया है,या मार दिया है,या फिर कुछ और।“
उॅंघते हुए बजाय उसकी समस्या को सुनने के उसे डांट कर भगा देते और एक जम्हाई लेकर पुनः खर्राटे भरने लगते।
स्कूल जाने का समय जैसे जैसे करीब आता नखड़ू को तमाम बिमारियां तमाम परेशानियां घेरने लगती। कारण कि वह स्कूल जाना नहीं चाहता था। परंतु सरन भी उसके इस आदत से परीचित था। उसके सभी बिमारियों का इलाज जानता था, वह , तभी तो उसके तमाम बहानों के बावजूद उसे उठाकर, बांधकर स्कूल तक ले जाता। धीरे-धीरे नखड़ू स्कूल के लिए जाने लगा परंतु स्कूल नहीं पहूॅंचता था। बल्कि गांव के दक्षिणी छोर पर खड़ा खंडहरों के बीच में एक विशाल मोटी कैथा के पेड़ के पास कैथा तोड़ने पहुॅंच जाता। कहने वाले कहते थे कि इस खंडहर में एक चुड़ैल है जो किसी को अकेले पा जाए तो उसे डरा देती है बिल्कुल बड़े बड़े दांत निकालकर कई तो उसे बिल्कुल दोपहर के समय सफेद कपड़ा पहने टहलते हुए देखा है, कईयों के तो हाथ पकड़कर खींच भी रही थी, परंतु किसी तरह से बचकर वहां से भागे। लेकिन नखड़ू के साथ ऐसा अभी कुछ भी नहीं हुआ था। शाम को जब पाठशाला के छुट्टी को घण्टा सुनता तो पटरी झोला उठाता और घर की तरफ चल देता। 
नखड़ू की यही प्रक्रिया चलती रही। कभी जब वह अधिक कैथा और इमली भी पा जाता तो लेकर स्कुल भी जाता और अपने साथ के लड़कों को खिलाता जो कि इसके पक्के मित्र हो गये थे। और कुछ को दुद्धी और स्याही के बदले बेचता भी, अब मंगरू भी स्कूल जाने लगा परन्तु वह भी अपने भाई के ही नक्शे कदम पर चलकर उसकी परम्परा को आगे बढ़ा रहा था। 
किसी तरह से दोनों भाई पाॅंचवीं पास किये या यॅूं कहिए कि पास किये गये। इसके बाद अब आगे पढ़ने के लिए पाठशाला छोड़कर उन्हें दूर किसी विद्यालय में जाना था। परन्तु उनमें न तो पढाई के प्रति कोई रूचि थी और न ही सरन उनको पढाने में सक्षम था। अतः दोनों भाइयों ने पढाई छोड़ दी। अब दोनों भाई घर पर ही रहते। थोड़ा बहुत जो घर का काम था उसी में सरन का हाथ बटा लेते। वैसे करने को था ही क्या। दादा परदादा की छोटी सी करीब पाॅंच विस्वा की जमीन का एक टुकड़ा। सरन बताता है कि उसके दादा एक जमींदार के यहां नौकर थे। बड़ी सेवा की थी उन्होंने जमींदार की सो जमींदार ने यह जमीन उन्हे दान में दी थी। कहते हुए सरन अपने आपकेा अत्यंत गौरवान्वित महसूस करता था। 
  सरन इसी जमीन के  टुकड़े केा अपने बाप दादा की अमानत समझकर उसे सीने से लगाकर रखा था। जी तोड़ उसमें परिश्रम करता और उसमें से अधिक से अधिक पैदावार लेने के लिए तमाम जतन करता रहता। उसमें उगने वाले हर पौधे में वह अपने दादा के अक्स को पाता ओैर उससे प्राप्त अनाज को वह अपने पूर्वजों का प्रसाद मानता और जिसका अत्यंत श्रद्धा के साथ वह उपभोग करता था। उसी सछोटी सी जमीन के टुकड़े से इतनी पैदावार हो जाती कि उसके परिवार का खर्चा चल जाता था। पितरों के इसी प्रसाद के कारण सरन उस जमीन से मानसिक रूप से जुड़ गया था। खेत के एक पौधे की क्षति भी उसक लिए असहनीय पीड़ा का कारण बन जाती थी।इस खेत की धूल, अन्न जिसमें खेल खाकर वह और उसके बच्चे बड़े हुए उसकी महक वह हर पल अपने रोम-रोम में महसूस करता। बात पिछले साल की ही है जब उसके खेत की फसल को कोई जानवर नुकसान पहुॅंचा दिया था, खेत पर सरन पहुॅंचा यह देखकर असीमित पीड़ा से कराह उठा था वह, और घण्टों खेत के मेड़ पर बैठकर उदास मन से इन नष्ट हुए पौधों को एकटक निहारता रहा, विशाद इतना कि कई दिन तक खाना नहीं खाया।
समय के साथ सरन की उम्र ढ़लती गयी और बच्चों की उम्र चढ़ती गयी। नखड़ू बड़ा होने के कारण अब अपनी जिम्मेदारियों का कुछ समझने लगा था परंतु मंगरू में अभी लड़कपन का अल्हणपन था। एक दिन नखड़ू बोला-
”बापू हम शहर कमाये के लिए चले जाई का।“
एक बार पैर से पगड़ी तक नखड़ू को सरन ऐसे देखा जैसे कोई माॅं अपने बच्चे को मासूमियत भरी निगाह से देखती है जब वह ऐसे पोखरे में नहाने की जिद करता है जिसकी गहराई का उसे कोई अंदाजा नहीं होता। फिर प्रश्नवाचक भाव चेहरे पर लाते हुए बोला-
“क्यों रे ? तुमका यहाॅं गाॅंव में का चीज कै कमी है। अच्छा भला-चंगा तो है। का बदबू आ रही है ई गाॅंव की माटी से या महक रही है शहर के पक्की सड़कन से। माटी की सोंधी गंध की परख तुमका महसूस नहीं हो रही है नखड़ू? काम की कमी है का हमारे गाॅंव मा, करो तो तमाम काम पटे पड़े हैं। और अभी तो तूं कितना छोटा है। तुं का जाने शहर के बारे में, मूरख बनाय देत हैं देहाती लोगन का ऊ शहर वाले।”
तुं शहर गया है का बापू ? टपाक से नखड़ू पुछ पड़ा। 
नहीं रे ! सुना है शहर के बारे में। ऊ का नाम है हरिया के बापू का........
’सरजू ’ तुरन्त उत्सुकता एवं तिव्रता के साथ नखड़ू बोला था।
हाॅं-हाॅं वही। गया था न ऊ शहर। वही ई सब बतावा रहा हमसे।”
“हाॅं बापू ई बात तो सही है कि शहर के लोग बहुत चालाक होत हैं लेकिन हम भी तो पढ़ा लिखा है पाॅंचवी तक। गिनती पहाड़ा सब तो याद है। तेरह को छोड़कर पहाड़ा तो पन्द्रह तक याद है। जाने दो न बापू हमका शहर। कमाकर खूब तुम्हारे लिये पैसा भेजूंगा”
नखड़ू पल हर पल अपनी बात कहता और जैसे ख्वाब में डूबता चला जा रहा था। सरन उसकी बात को नादानी समझकर अनसूना करता गया।
एक दिन काफी अंधेरा हो जाने पर सरन मजदूरी करके लौटा था। मंगरू सामने नीम के पेड़ के नीचे बंधी गाय के बछड़े को दुलरा रहा था। थकावट से चूर सरन बैठते हुए बोला-
”अरे मंगरू का कर रहा है बिटवा, अंधियार होय गवा, बत्ती जलाय दो न अऊर ऊ नखड़ू कहाॅं है।“
“पता नहीं बापू कहीं खेल रहा होगा गुल्ली-डंडा।” मंगरू बड़े ही बेरूखी से बोला।
”अरे ! ई इतना अंधियार होय गवा है अभी ससुरा ऊ गुल्ली डंडा खेल रहा है। आज आये घर तो बताउॅं का होत है गुल्ली-डंडा।“- तनिक जबड़े को सख्त करते हुए गुस्से से बोला था सरन।
तनिक अंधेरा और बढ़ गया चारों तरफ निस्तब्धता छा गयी, झेंगूरों की आवाज में तिव्रता और मानवीय आवाज में शून्यता आती चली गयी। बीच-बीच में झेंगूरों के बेसूरे कर्कश डरावने सुरों के बीच कुत्ते अपने तबला राग को निकालकर अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे थे। 
सरन की चिंता बढ़ती जा रही थी-
”अभी तक आवा नहीं कहां जाय सकत है ससुरा। कहीं हरिया के घर अभी तक तो बैठा ना है। अरे मंगरू ! ऊ थोड़ा लालटेन उठाव, चल देख लें कहीं हरिया के घर तो ना बैठा है।“
मंगरू झल्लाते हुए बोला-”का बापू तुमहूॅं परेशान कर रखे हो। तुम जाओ मैं ना जाबों।“
सरन आग्रह पूर्वक कहा-“अरे चल बिटवा, अब का किया जाय, हरिया के घर तो कम से कम देख लिया जाये। ई जाड़ा पाला में ससुरा कहाॅं रही गै। अब तक कभी तो इतने पहर तक कहीं नहीं रूकत रहा। आज मिले ससुरू त उनकर कचूमर बनाइत है।”
इतना कहकर सरन अपनी लाठी उठाकर, मोटा भेंड़ के बाल वाला कम्अल जिसपर चारखाने बने थे को जैसे तैसे अपनी शरीर पर लपेटते हुए घर से निकला। कम्बल का बांया किनारा रहरहकर जमीन को छू लेता। लगता जैसे जमीन को छू-छूकर ठण्डक का अनुमान लगा रहा हो। दांये हाथ में थमी बांस की लाठी निश्चित अंतराल के बाद जमीन ठक-ठक के साथ गिरकर जैसे दुरी नापने का प्रयास कर रही हो। पीछे-पीछे मंगरू रेंगता चला जा रहा था। एक हाथ में लालटेन लटकाए, दूसरे हाथ को सीने में दुबकाए, मुट्ठी बांधे जैसे समस्त ठण्डी को मुट्ठी में बांधकर कह रहा जो कि बस इतनी सी एक मुट्ठी ठण्डक है, परंतु उसके खड़े रोंगटे यह बता रहे हैं कि यह झुठ बोल रहा है,। ठण्डक एक मुट्ठी या दो मुट्ठी नहीं है बल्कि असीमित है यह इन रोंगटों की तरह। बीच-बीच में सरसराती ठण्डी हवा पास से किसी डरावने सपने की तरह गुजरती तो दांत की कटकटाहट रोंगटों की बात का समर्थन करते प्रतीत होते।
सरन आगे लाठी लिए मंगरू पीछे-पीछे लालटेन लिए ठण्डक की कठोर चादर को चिरते हरिया के घर की तरफ बढ़ रहे थे। रास्ते में इन्हें देखकर कुत्ते एकाएक भौंकने लगते फिर धीरे-धीरे पास आकर शांत हो जाते और उनके पैरों को सूंघकर पुॅंछ हिलाने लगते मानो वे अपना आत्मसमर्पण कर दिए हों। सरन लम्बी-लम्बी डग भरता जल्द ही हरिया के घर पहुंच गया। अभी सब खाना खकर अलाव के पास बैठे थे, सोए नहीं थे। हरिया पुआल के बिछौने  में घुसा कम्बल ताने लेटा था। पेट पर रेडियो लिए उसमें घुमा घुमाकर कुछ कर रहा था। यह वही रेडियो था जो कि शहर से लाया था उसका बापू सरजू उसके लिए। इस रेडियो की बदौलत गाॅंव मे सभी लड़कों में धाक जम चुकी थी हरिया की।
घर के सामने दो मानव सम आकृतियों को देखकर अलाव के पास से ही हाथ की गरमी को मसलते हुए सरजू बोला-
”अरे ! कौन है भई उधर ? “
”हम हैं सरजू भाई सरन।“ कहते कहते वह अलाव तक पहुंच चुका था। 
सरन को इस समय इस ठण्डक में देखकर हैरानी से बोला सरजू-
”अरे सब खैरियत तो है न सरन भाई, का बात है जो तुमका इतनी रात गये आना पड़ा, और ई मंगरूआ के काहे परेशान किया ई ठण्डक मा।“
सरन चेहरे पर परेशानी के भाव लिए बोला-
”इहां नखड़ूआ है का सरजू भाई। अभी तलक घर नहीं पहुॅंचा।“
सरजू के चेहरे पर परेशानी के भाव डूबने उतराने लगे-
”का कह रहे हो सरन ? अभी तक ऊ घर नहीं पहुंचा। आज तो यहां ऊ आया ही नहीं। कहां चल गया?।“
इतनी बात सुनते ही सरन के चेहरे के भाव तेजी से बदलने लगे। मन में तमाम आशंकाएं उठने लगी। उसकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था कि अब क्या करे? इस कड़कड़ाती ठण्डक में अब कहां खोजे उसे।
उदास और हताश भाव से बोला-
”अच्छा सरजू भाई जाईत है। थोड़ा रंजन काका के घर भी पता कर लें, का पता उहीं ससुरा सोय गै होय।“
सरन और मंगरू शरीर व मन से रंजन काका के घर पहुंचे। नखड़ू वहां भी नहीं मिला। थक हार कर दोनों अपने घर आ गये। अब तक मंगरू को काफी ठण्डक लग चुकी थी। उसके कांपते शरीर व कटकटाते दांत ने सरन का ध्यान अपनी तरफ खींचा। सरन एक दारूण दृष्टि उसके ऊपर डाली तो देखा उसके आंखों से टुटते मौन मोतियों की लड़ी हाथ पर गिर-गिरकर टुट रहे थे। उसकी यह दशा देखकर सरन जो कि अंदर ही अंदर जो अपने आंसूओं को पीता चला जा रहा था। बोला-
”अरे बिटवा तुं रोअत काहें हो। नखड़ू आ जाई न, तुम रोओ न। अरे तुम तो कांप रहे हो ठंडक से। ओओ आग जलाय दूॅं।“ कहकर वह आग जलाने लगा।
मंगरू कंपकपाते होठों और ठण्ड से सिकुड़ चुकी जिह्वा को गतिमान किया-
”बापू कहां गया होगा भइया, खोज लाओ बापू भइया को।“ कहते कहते मंगरू हिचकियां लेते हुए रो पड़ा था। उसकी यह दशा देख सरन नहीं रोक पाया अपने आपको। आॅंखों में जैसे आंसूओं की बाढ़ सी आ गयी, जिसे पीने में अब असमर्थ था सरन, सो आंसूओं की पतली मोटी सरितायें फुट पड़ी सरन के चिंतित मटमैली आंखों से। लिपट कर दोनो बाप-बेटे एक दुसरे को आंसुओं से भिगाते रहे, जिसके प्रभाव से बगल में जलती हुई आग जल्द ही बुझ गयी जैसे किसी ने उस पर पानी डाल दिया हो। धुएं का गुबार सा उठने लगा। धुएं की निक्ष्णता आंख की सरिता के वेग को और तिव्र कर रहे थे। सरन मंगरू को उठाकर धीरे से पुआल के बिछौने पर लिटाकर कम्बल ओढ़ा दिया तथा बगल में खुद लेट रहा।
सरन के मन में तमाम विचार आते जाते रहे। विचारों के विप्लव में वह गोते लगा-लगाकर नखड़ू के ही अस्तित्व को तलाश रहा था। न जाने कहां होगा, कैसे होगा इस ठण्डक में। मन के अंदर बवंडरों का जलजला सा उठता फिर शांत हो जाता। हड़कम्प सी मची थी मन मस्तिष्क में परंतु बाहर घेर निरवता अपना साम्राज्य स्थपित करती जा रही थी। सरसराती हड्डियों तक को कंपा देने वाली पुरवाई, झिंगुरों की तारतम्य आवाजें, कुत्तों का भौंकना तथा बीच-बीच में मंगरू की सिसकियां इस निरवता को भंग कर रही थी।
सुबह अलाव के पास बैठा सरन एकटक जलती आग को देख रहा था, हवा के झोंके से सुलगती भूसी एक पल के लिए चमक उठती दूसरे ही पल काली राख में बदल जाती। उसमें से उठता धुंआ कभी सीधे ऊपर तो कभी पूरब, पश्चिम तो कभी दक्षिण मनमौजी दुःख की तरह चल पड़ता। उसमें खोदकर मंगरू छोटे-छोटे आलुओं को डालकर ढ़क देता तो कभी निकालकर उन्हें दबाकर उनपके पकने का अनुमान लगाता तो कभी संठे के एक छोर को जलाकर दुसरे छोर मुंह लगाकर बीड़ी जैसे पीने का आनन्द उठाता। सरन इन सब घटनाओं को एकटक किसी दार्शनिक की तरह देख रहा था। चेहरा इतना गंभीर जैसे वह अनंत ज्ञान की गहराई में पहुंचकर प्रकृति के किसी गूढ़ रहस्य को सुलझाने का प्रयास कर रहा था। अपलक दृष्टि, स्पंदनहीन चेहरा, चेहरे का भाव क्रमशः गाढ़ा, हल्का, धुंधला फिर चमकदार होता हुआ जैसे पा लिया हो कोई सागर का मोती, प्रकृति का वह गूढ़ रहस्य, चेहरा गंभीर से गंभीरतम से क्रमशः गंभीरतर होता हुआ। तभी हरिया की आवाज ने सरन को जैसे यथार्थ के धरातल पर ला पटका।
”सरन चाचा.............सरन चाचा।”
“हां...............कौन? अरे हरिया तुं !” सरन जैसे नींद से जागकर बोला हो।
हरिया बोला-
”चाचा कल रात आप नखड़ू को खोज रहे थे न, वही बताउब के खातिन हम आवा है।”
सरन अत्यंत ब्यग्रता से पूछा-
”कहां है हमार नखड़ू, जल्दी जल्दी बताव बिटवा।”
पास बैठा मंगरू भी अवाक सा मुॅंह खोले, हरिया की बात सुनने को चैतन्य हो गया।
हरिया बोला-
”ऊ का है न चाचा नखड़ू तो शहर गया। ई खबर हमका आज सुबह दीनू से मिली । ऊ शहर से आज आवा है न उसी से नखड़ू स्टेशन पर मिला रहा। कहत रहा कि बापू से कह देना कि हम शहर जा रहा हूॅं। हमरे लिए परेशान न होना।“
इतनी बात सुनकर मंगरू व सरन एक दूसरे को निहारने लगे। आॅंखों से ही मूक संवाद होने लगा। कंपकपाते होंठ व आंखों की नमी को जलती भूसी कम न कर सकी। सरन को लगा जैसे उसका कोई तोता उछ़ गचया हो जिसमें उसके प्राण बसा करते हों। मंगरू कुछ समझ नहीं पा रहा था कि क्या करे वह। उसक घोंसले का उसके दुख-सुख का साथी उसका भाई उसके घोंसले से उड़कर किसी और घोंसले में अपना ठौर खोजने निकल पड़ा है। न जाने कहां किस हाल में होगा वह। अब कौन उसे कैथा व इमली लाकर देगा। काौन उसे गुल्ली डंडा खेलायेगा। लाख गलतियां होने पर भी इसी का पक्ष लेने वाला इसका भाई कब लौटेगा? कौन बताए इसे.......।
वक्त अपनी उसी रफ्तार से आगे बढ़ता रहा बिना पीछे देखे और बीना आगे की सोचे। कभी दांए करवट से तो कभी बांए करवट। मंगरू ने तरूणाई का आलिंगन किया तो सरन ने बुढ़पे को स्पर्श किया। मंगरू की शादी हो गयी, बहू घर आई तो घर में जैसे खुशियों का साम्राज्य छा गया। सरन तो जैसे दुख की परिभाषा ही भूल गया। परंतु रह-रहकर नखड़ू की याद सताती रही। ये यादें मन में टीस की तरह उठती जो उसे अतीत में खींचने का प्रयास करते परंतु सरन का वर्तमान अधिक शक्तिशाली साबित हो रहा था।
सरन अब मजदूरी पर जाना बंद कर दिया। मंगरू ही मजदूरी करता, उसी से घर का खर्च चलता। बहू बड़े ही मन से सरन की सेवा करती। एक आदर्श गृहणी के सारे गुण मौजूद थे उसमें। घर का तो जैसे काया कल्प ही हो गया था। सरन ने तो कभी आशा भी न की थी कि उसके दिन इस तरह से खुशगवार हो जायेंगे। यह क्रम अभी टुटा नहीं था, मंगरू को बेटा पैदा हुआ तो सरन को नखड़ू की याद आ गयी। वैसा ही कथा भोज जैसा नखड़ू के पैदा होने पर सरन ने किया था, मंगरू ने किया। सरन का घर खुशियों से पटता जा रहा था। बच्चे की किलकारी ने पुरे घर के कोने-कोने को भर दिया। इसी बीच वह दिन कैसे भूल सकता है सरन, जब एक नौजवान एक हाथ में बैग दूसरे में सुटकेश, एक बैग पीठ पर लादे घर के सामने आकर रूका। हौले से बैग रखकर लगभग दौड़ते हुए दरवाजे पर बैठे सरन का पांव छुते हुए बोला-
“पांव लागूं बापू !”
धुंधले आंखों से मुंह ऊपर करके देखते हुए सरन बोला-
“भगवान कुशल रखे बिटवा। लेकिन हम तुमका पहचाना नहीं बिटवा।”
”अरे बापू मुझे नहीं पहचाना, अरे मैं तुम्हारा नखड़ू।“
”मेराऽऽ .........नखड़ू..........।“
”हाॅं बापू हाॅं ................मैं तुम्हारा नखड़ू हूं।“
”अरे................तुम तो एकदम बदल गै हो। पहचानै में ना आवत हो। कहाॅं अब तलक थे? कईसे कउन हालत में थे। कभी कुछ खबर भी नै दिए।“
कहते कहते सरन की बुढ़ी आॅंखों में बुढ़े आंसुओं की सफेद चादर तन गयी। गला जैसे रूॅंध सा गया। जिह्वा तो जैसे उच्चारण करना ही भूल गयी सिर्फ हाथों के इशारों से उसे पास बैैठने का इशारा करके एकटक निहारता रहा एक दम मौन। 
नखड़ू के घर आने से तो सरन के घर रोज उत्सव जैसा माहौल रहता। नखड़ू से लोग मिलने आते और शहर के बारे में तरह-तरह की बातें पूछते। नखड़ू भी उन्हें बड़े चाव से महिमा मण्डित करके बताता। अपने बारे में तरह-तरह की बातें बताताकि कैसे वह शहरगया और किन-किन मुसीबतों का सामना करते हुए शहर में काम पाया था। फिर जी तोड़ मेहनत करके वह कैसे पैसा इकट्ठा करता रहा। और यह भी बताया कि शहर में पैसा कमाना इतना आसान नहीं है जैसा कि गांव वाले सोचते हैं। बड़े पापड़ बेचलने पड़ते हैं तब कहीं जाकर काम मिल पाता है। 
सरन ने अब नखड़ू की भी शादी कर दी। बड़ी बहू घर आयी। मंगरू के विवाह की रौनक और पोते के पैदा होने की खुशी अभी कम भी नहीं हुई थी कि फिर से वही विवाह की रौनक वही चहल-पहल घर बाहर छा गयी। शायद सरन के लिए यह अंतिम बार था। क्योंकि बड़ी बहू का मिजाज छोटी के बिल्कुल विपरीत था। जल्द ही घर के खुशियों भरे माहौल को जैसे तनाव का दीमक लग गया। बड़ी बहू को यह बात खटकती थी कि उसका पति शहर से कमा कर लाया है जिसका उपभोग घर के अन्य लोग भी करते हैं जबकि उस पर तो सिर्फ उसका ही अधिकार है। उसे यह बात कतई बर्दाश्त नहीं थी कि उसके पति की कमाई में उसकी देवरानी भी शरीक हो। इन्हीं सब बातों का लेकर बार-बा रवह झगड़ा करती परंतु छोटी बहू अपने शीलता और सदाचार से हमेशा उसे पराजित करती। इसके इसी शीलता का परिणाम था कि सरन व खुद नखड़ू भी उसका पक्ष लेते। जो कि बड़ी बहू के डाह में द्विगुणित बृद्धि कर देता। नखड़ू कई बार उसे समझाया। कभी-कभी तो उसे मार पीट भी देता परन्तु उसके ब्यवहार पर इसका कोई असर नहीं था। आखिरकार उसके पुरे घर को तनाव के दीमक खोखला बनाते चले जा रहे थे। 
अंततः नखड़ू को अपने पत्नी के सम्मुख हथियार डालना पड़ा। बात बंटवारे तक आ गयी। आखिर सरन को उम्र के अंतिम पड़ाव पर अपने छोटे से घर में जिसके बारे में कितने लौकिक व अलौकिक सपने देखे थे, एक नई तीसरी दीवार भी बनते देखी। घर का बंटवारा हो गया। जमीन थोड़ी सी थी। सरन से साफ तौर पर कह दिया कि मैं जीते जी इस जमीन को बंटने नहीं दूंगा। आखिर यह हमारे दादा-परदादा की निशानी है। मैं जब तक जिंदा हुॅं खेती करूंगा। परंतु मामला यहाॅं आकर फंसा कि सरन किसके साथ रहे। मंगरू के या नखड़ू के।
छोटी बहू तो कह रही थी कि बाबू जी आप हमारे साथ रहें। सरन भी यही चाहता ाथा। परंतु बड़ी बहू इस पर राजी नहीं हुई। वैसे तो वह चाहती  थी कि वो हमारे साथ न रहे। परंतु यह सोचकर कि ये जिधर जायेंगे जमीन की उपज उसकी होगी और साथ ही साथ अगर बुड्ढा दो रोटी खायेगा तो क्या घर का अन्य काम तो करेगा। छोटी बहू तो यहाॅं तक कह रही थी कि बाबूजी आप हमारे साथ ही रहिये हमको जमीन-वमीन का कोई मोह नहीं। बस मोह है तो आपके स्नेह की । आप जमीन उन्हीं को दे दीजिए। परंतु इसपर भी बड़ी बहू राजी नहीं हुई। अंततः निर्धारित हुआ कि सरन छः महीने छोटी बहु के साथ और छः महीने बड़ी बहू के साथ रहेगा।
तब से सरन कभी इस पलड़े में तो कभी उस पलड़े में होता हुआ अपने जीवन यात्रा पर अग्रसर हो रहा था। अपने इस जीवन यात्रा में वह छोटी बहू को छांव तो बड़ी को धूप मान रहा था। छः महीने धूप के बाद छः महीने तक छांव में यात्रा करनी पड़ती थी। समय यहाॅं अपने ही गति से चल रहा था। परंतु सरन को समय की इस गति में असमानता नजर आती। लगता समय कभी-कभी रूक सा गया है और कभी-कभी समय को जैसे पंख लग गया हो, इधर आया और उधर समाप्त। जब सरन मंगरू के साथ होता तो उसे लगता जैसे समय उड़ता चला जा रहा है। और यही वक्त जब नखड़ू के साथ बिताने होते तो लगता जैसे समय के पंख ही भीग गये हैं।
जब तक नखड़ू था तब तक तो सरन को कुछ सहूलियत थी। परंतु जब से नखड़ू शहर गया तब से तो सरन के लिए बड़ी बहू के साथ एक-एक पल रहना भारी पड़ रहा था। नखड़ू का एक लड़का था उसी के साथ सरन कुछ पल के लिए सहज महसूस करता परंतु यह स्थिति भी कुछज्यादा देर तक न रहती , कारण की बड़ी बहू बच्चो को सरन के पास रहने ही नहीं देती और सरन को कोई न कोई काम ओढ़ा देती जिसे सरन अपनी बुढ़ी हड्डियों के सहारे ढोता रहता। इस तरह सरन जीवन के खट्टे-मीठे अनुभवों को अपने स्मृति पटल पर छापता रहा।
परन्तु आज जो बहू के मुख से शब्द निकले न जाने क्यों उसके स्मृति पटल पर एक चोटिल निशान छोड़ गये। जिसके चोट से निकले रक्त से उसकी पुरी स्मृति रक्त वर्ण में बदलकर स्याह होती जा रही थी। सोच रहा था, क्या आदमी इसीलिए अपनी संतानों को इतने लाड्प्यार से पालता है कि एक दिन.............
तभी उसके इस विचार प्रवाह को भंग करती हुई एक मीठी आवाज उसके कान में दस्तक दी-
”बाबा.....बाबा.....कहां हो बाबा।“ तोतली आवाज में उसका पोता बोलता हुआ आकर उसकी गोंद में बैठ गया। और उसकी ठोड़ी को उठाकर अपने पाजामे के नाड़े के पास से रोटी का एक टुकड़ा निकालते हुए बोला-
”बाबा ! ये लो लोटी खाय लेओ। अउल अम्मा केा नै बताना। नही ंतो ऊ हमका मालेगी।“
बच्चे की इस तोतली अमृतमयी वाणी ने सरन के सूखते प्राणों में जैसे नव प्राण सा छाल दिया हो । उसके आॅंखों से निर्विकार स्नेहमयी अश्रूधारा फूट पड़ी। सिने से चिपकाए काफी देर तक सरन बच्चे की पीठ सहलाता रहा। मरहम पट्टी की तरह सीने से चिपका उसका पोता जैसे उसके दिल के सारे घावों को भरता चला जा रहाथा। सरन अपने अंदर एक नई स्फूर्ति और खुशी का अनुभव कर रहाथाज्ञ। झट उठा पोते को कंधे पर उठाया और लम्बी डग भरते गांव की एक दुकान पर पहुॅंचा और वहां से छोटी-छोटी रंगीन मीठी गोलियां खरीद कर पोते को दिया। मीठी रंगीन गोलियां पाकर बच्चा अत्यंत खुश हुआ। पुनः बच्चे को कंधे पर बैठाकर सरन घर की तरफ वापस चल दिया। कंधे पर बैठा बच्चा एक मीठी गोली अपने मुख में डालता तो एक कमीठी गोली सरन के मुख में डालता। सरन मना करता परंतु जिद करके उसका मुख खुलवाता और धीरे से एक मीठी गोली उसके मुख में डाल देता।
सचमुच कितनी यथार्थ शिक्षा छुपी थी बच्चे के इस आचरण में। काश बड़े भी बच्चों के इन आचरणों से कुछ शिक्षा ले सकते। ढाल सकते ऐसे आचरणों को अपने जीवन में तो समाज आज क्या से क्या हो जाता। हमारे बुजूर्ग जिनके हम अंश हैं । जिनके सामने हम एक बच्चे ही तो हैं फिर उनके सम्मुख हम बच्चे सा आचरण क्यों नहीं करते ? क्यों करते हैं हम उनके साथ बड़ों सा आचरण? ये हमारे बुजूर्ग जो कुछ ही दिनों तक हमारे साथ रहेंगे तो क्यों नहीं ढ़ाल लेते हम अपने आचरण को उनके अनुकूल? शिवाय इसके हम यह आशा करते हैं कि ये बुजूर्ग जो अब कि जिस परम्परा, आचरण पर चलते आ रहे हैं वे अपने आचरण को हमारे अनूकुल बदल लेंगे कैसे सम्भव है यह ? जो आप युवा होकर नहीं कर सकते तो वे यह परिवर्तन बृद्ध व कमजोर होकर कैसे कर सकते हैं।
सरन कदम कदम घर की तरफ बढ़ रहा था। बच्चा क्रमशः एक मीठी गोली अपने मॅंुह में एक सरन के मुंह में डाले जा रहा था। सरन को ऐसा लग रहा था जैसे हर मीठी गोली के साथ अपने जीवन के विभिन्न पड़ावों को जीता चला जा रहा हो। घर पहुंचते-पहुंचते मीठी गोलियां खत्म। सरन फिर उसी ठहराव पर आ गया। वही बुढ़ापा, वही घर, घर के बीच आंगन में एक दीवार सरन के लिए दीवार के एक तरफ सुख की छांव तो दुसरी तरफ दुख के धूप थे। परंतु सरन को आज इस धूप में भी कुछ छाया का एहसास हुआ था। यह छाया बनकर उसके कंधे पर था उसका पोता। अब सरन बड़ी बहू के हर बाता को अनसूना करके बिल्कुल एक सिरे से नई स्फूर्ति के ससाथ फिर से जीने की तमन्ना ठान लिया था। कम से कम अपने पोते के वास्ते। 
शाम हुई अंधेरा हुआ और फिर वही कड़ाके की ठण्डी रात सब अपनी निरंतरता बनाए प्रकृति के नियमों का पालन करते हुए निरंतर अग्रसर ऐसे में भला ऊषा देवी कैसे तोड़ सकती हैं प्रकृति के इन नियमों को। सरन उठा धीरे से अपनी कुदाल कंधे पर रख खेत की तरफ चल पड़ा एक बार फिर से जीवन को तलाशने। 
सच यही धरती ही तो है जीवन का श्रोत, जीवन की आशा, ऐसे ही और भी बहुत कुछ जो बीज के अंकुरण के साथ प्रकट होता है। यही अलौकिक और लौकिक सत्य है।

अद्भुत ब्रह्माण्ड

अद्भुत ब्रह्माण्ड 

(मनोज)
जीवों के उत्पत्ति के विकास क्रम में जब प्रज्ञमानव का आर्विभाव हुआ तो इस प्रज्ञमानव में अपने आस-पास के धरातल एवं अन्य प्राकृतिक वस्तुओं के बारे में जानने की जिज्ञासा उत्पन्न हुई। जैसे-जैसे मनुष्य ने सभ्यता की ओर कदम बढाया उसके अंदर तमाम कौतूहल उत्पन्न होते गये। उसके अंदर सृष्टि के रहस्यों को जानने की जिज्ञासा और प्रबल होती गयी। इस प्रबल जिज्ञासा का परिणाम यह हुआ कि मनुष्य ने तमाम कहावतों को झुठलाते हुए अनेक रहस्यों का पर्दाफास किया।
  21जुलाई सन 1969 का वह दिन जब पृथ्वी से 3,84,000 किमी. दूर स्थित किसी अनजान जगह पर एक यान उतरा उसमें से दो व्यक्ति एक अजीब प्रकार की पोषाक पहने हुए निकले। अगला ब्यक्ति अगल-बगल का सूक्ष्म निरीक्षण करने के बाद धीरे सेे अपने पैरों को उस विरान जगह पर स्थिर कर दिया। इस ब्यक्ति के पैर के आस-पास धीरे से धूल कण उड़ी, षायद ये धूलकण उस ब्यक्ति के सभ्यता के यषगाान कर रहे थे। और अपने रहस्य को ख्ुाद ब खुद बयान कर रहे थे। आखिर यह ब्यक्ति कौन था और कहाॅं से आया था? और कैसे आया था? यह तमाम प्रष्न हमारे मन में कौंध से जाते हैं। आइये जाने यह ब्यक्ति कौन था? कहाॅंसे आया था? आप को यह जानकर खुषी होगी कि वह ब्यक्ति कोई और नहीं बल्कि मनु पु़त्र मानव ही तो था। जिसका नाम था नील-आर्मस्ट्रांग और उसके साथी का नाम एडविन एल्ड्रिन था। और जिस सवारी से वे आये थे उसका नाम था ईगल। अब प्रष्न बनता है कि वे कहाॅं गये थे? तो भारतीय परिदृष्य में इसका जवाब इस प्रकार देना मेरे समझ में जरा भी अनुचित नहीं है, कि वे ननिहाल गये थे। क्योंकि जहां वे गये थे उसका नाम चंद्रमा है, चूंकि चंद्रमा को हम मामा और पृथ्वी को माता कहते हैं। खैर छोडि़ये इन बातों को हम अपने मुख्य पहलू पर आते हैं। नील-आर्मस्ट्रांग और एडविन एल्ड्रिन एक अभियान के तहत चंद्रमा पर गये थे। चन्द्रमा पर मानव के पहॅंूचने के  बाद तमाम रहस्यों का पर्दा फास हुआ और मानव की यह चन्द्रविजय मानवीय सभ्यता के लिए एक अभूतपूर्व उपलब्धि थी।   
  पृथ्वी वासियों के वैज्ञानिक उपलब्धियांे को देखकर ऐसा कहा जा रहा है कि ईष्वर ने सबसे ज्यादा बुद्धिमान प्ृथ्वी पर रहने वाले मानव को बनाया है, परंतु एक विचारधारा के अनुसार इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि मानव सभ्यता से भी विकसित कोई सभ्यता अवष्य है जिसकी तुलना में हमारी वैज्ञानिक प्रगति नगण्य है। हम उड़नतष्तरियों के अस्तित्व को कत्तई इंकार नहीं कर सकते।  ऐसा माना जा रहा है कि ये उड़नतष्तरियां अन्य ग्रहों से भेजी जाने वाले खोजी यानें हैं। कुछ ब्यक्ति तो दावा करते हैं कि इन उड़नतष्तरियों पर वे मानव सदृष्य जीवों को देखें हैं। वे उनके हुलिया को भी बताते हैं। परंतु यह मानकर चलना चाहिये कि मानविय सभ्यता के विकास का यह क्रम अपनी प्रारम्भिक अवस्था में है, और भविष्य में आषा की जा सकती है कि मानव अन्य ग्रहों पर भी विजय प्राप्त करेगा और उड़नतष्तरी जैसे अनगिनत रहस्यों का पर्दाफास करेगा। 
 इससे पहले कि मैं सौरमंडल की उत्पत्ति के सम्बंध में आपको बताऊॅं, हमें यह जानना होगा की आखिर यह सौरमंडल या सौरपरिवार आया कहाॅं से? क्या है इसका इतिहास? यह सब जानने के लिए आवष्यक है कि हम कुछ पारिभाषिक शब्दों को जान लें क्योंकि आगे के विष्लेषण यात्रा में हमें इन्हीं शब्दों से रूबरू होना होगा।

      वैज्ञानिक भाषा में हम आकाष को अंतरिक्ष कहते हैं। दुसरे शब्दों में जब हम पृथ्वी के वायुमंडल से जैसे ही बाहर निकलते है, हम अंतरिक्ष में प्रवेष करते है। आकाष में दिखाई देने वाले समस्त तारागण ठोस, द्रव तथा गैसीय पदार्थों से बने हुए गोलाकार पिण्ड है, इन्हें हम आकाषीय पिण्ड कहते है। ऐसा माना जाता है कि ये सम्पूर्ण पिण्ड मूलतः एक जैसे हैं, परंतु कई बातों में इनमें काफी अंतर है। आप लोक शायद इस बात से अवगत होंगे कि जो पिण्ड पृथ्वी के निकट स्थित है वे छोटे होते हुए भी बड़े दिखाई पड़ते है, और जो पिण्ड पृथ्वी से दूर हैं वे बड़े होते हुए भी छोटे दिखाई देते हैं। प्रत्येक पिण्ड में गति पायी जाती है। जिससे उसमें गुरूत्वाकर्षण शक्ति उत्पन्न होती है, और प्रत्येक वस्तु को अपनी तरफ आकर्षित करती है। वस्तुतः हमारा अंतरिक्ष कितना विषाल है इसकी केवल कल्पना ही की जा सकती है।
सौरमण्डल
तारों के चारों तरफ चक्कर लगाने वाले ग्रहों, उपग्रहों, क्षुद्रग्रहों तथा अन्य आकाषीय चट्टानों के समूह को सौरमण्डल कहते हंै। इस प्रकार प्रत्येक तारे का अपना सौरपरिवार होता है। और ये सौरमण्डल अनंत आकाष के केन्द्र के चारों तरफ एक निष्चित नियम के अधीन गति करते है।
तारा
ऐसे आकाषिय पिण्ड जो स्वयं के प्रकाष से प्रकाषित होते हैं उसे तारा कहते हैं। हमारे सौरमण्डल का तारा सुर्य है। इन तारों से उत्पन्न ग्रह इन्हीं तारों की परिक्रमा करते हैें।                                   
 ग्रह                                                                                                                                                                                         
ग्रह को अंग्रेजी में प्लानेट कहते हैं। प्लानेट का अर्थ होता है घुमना या चक्कर लगाना। अतः ग्रह वे आकाषीय पिण्ड है है। जो तारों के प्रकाष से प्रकाषित होते हैं, और एक निष्चित पथ पर तारों का चक्कर लगाते हैं। बुध, शुक्र, पृथ्वी ......इत्यादि, हमारे सौरमण्डल के ग्रह हैं। 
उपग्रह
ऐसे आकाषीय पिण्ड जो ग्रहों का चक्कर लगाते है, उन्हें उपग्रह कहते हैं। चन्द्रमा हमारी पृथ्वी का एक उपग्रह है। वर्तमान समय में वैज्ञानिक ज्ञान के विकास के फलस्वरूप मानव अपने बहुआयामी कार्यों की पूर्ति के लिए कृत्रिम उपग्रहों को पृथ्वी की कक्षा में स्थापित कर रहा है, जैसे- इनसेट श्रेणी के उपग्रह जो कि भारत ने अपने विभिन्न उद्देष्यों को पूरा करने के लिए भेजा है और आगे भी यह क्रम जारी है।
तारामण्डल
सौरमण्डल के अतिरिक्त दो-दो, चार-चार व इससे भी अधिक तारों का समूह होता है जिसे तारा मण्डल कहते हैं। सात ताराओं का समूह जिसे हम सप्तऋषि तारामण्डल कहते हैं, इसका एक अच्छा उदाहरण है।
ब्रमाण्ड
तारामण्डलों के अतिरिक्त बड़े-बड़े तारक पुंज होते हैं इन तारक पुंजों को निहारिका या ब्रमाण्ड कहते हैं। हमारी पृथ्वी अथवा यह सौरमण्डल जिस निहारिका के अंतर्गत आता हैं उसे आकाषगंगा कहते हैं, अनुमान हैं कि हमारी आकाषगंगा में तीन खरब तारे विद्यमान हैं।
   सूर्य एक साधारण तारे की भांति आकाषगंगा की एक भुजा पर स्थित है। विद्वानों का मत हैं कि इस सृष्टि में कोई स्थिर नहीं है। सूर्य जिसे हम स्थिर मानते हैं स्वयं आकाषगंगा के केन्द्र के चारों ओर 25 करोड़ वर्ष में एक परिक्रमा पुरी करता है। समूची आकाषगंगा स्वयं अपने केन्द्र पर घूमती है। और पचास करेाड़ वर्ष में एक परिक्रमा पुरी करता है। अंतरिक्ष में निहारिकाएं द्वीपों की भांति फैली हुई हैं इसी कारण इन्हें विष्व द्वीप कहा जाता है। निहारिकाओं में से कुछ निर्माणाधीन होती हैं और कुछ निहारिकाएं पूर्ण होती हैं। इनमें तारे ,ग्रह, उपग्रह आदि बन चुके होते है। हमारी आकाषगंगा एक पूर्ण निहारिका है। निहारिकाओं के निर्माण से इस अंतरिक्ष का उसी प्रकार विस्तार हो रहा है जिस प्रकार से हवा भरने पर एक गुब्बारे का होता है। इसी कारण ब्रम्हांड को वर्धिष्णु कहा जाता है। 
   प्रिय पाठकों, अब हम जानेंगे कि यह हमारा अद्भूत ब्रम्हाण्ड आखिर बना कैसे? क्या है इसका इतिहास? वैसे तो ब्रम्हाण्ड की रचना प्रक्रिया कई वैज्ञानिक सिद्धांतों पर आधारित है, फिर भी आषा करता हूॅं कि आपके लिए ब्रम्हाण्ड रचना की यात्रा अत्यंत ही रोमांचक एवं आनंदपूर्ण होगी, तो आइये हम चलते है अतीत के उस झरोखे में जहां से हमें ब्रम्हाण्ड रचना की प्रक्रिया अत्यंत ही जीवंत रूप में दिखाई पड़ती है....................
    आज से लगभग 15 बिलियन वर्ष पूर्व ब्रम्हाण्ड में उपस्थित छोटे-छोटे पिण्ड इधर उधर बिखरे पड़े थे। ये सभी पिण्ड गुरूत्वाकर्षण बल के कारण ब्रम्हाण्ड के केन्द्र की ओर आकर्षित होने लगे। ये सभी पिण्ड (अणु, परमाणु इत्यादि) एक ही बिन्दु पर एकत्रित होने लगे फलस्वरूप इन कणों के आपस में टकराने से कणों में घूर्णन गति उत्पन्न तथा घूर्णन बल के उत्पत्ति के कारण उष्मा विकसित होने लगी। छोटे-छोटे कण आपस में संयोजित होकर बड़े कणों में परिवर्तित होने लगे। यह नाभिकीय संलयन की प्रक्रिया थी, जिसके कारण ब्रम्हाण्ड में स्थित समस्त पदार्थ ब्रम्हाण्ड के केन्द्र में केंद्रित हो गया। नाभिकीय संलयन की प्रक्रिया निरंतर चलनें के कारण केंद्रित पदार्थ में अत्यधिक उष्मा विद्यमान हो गयी जिसके परिणामस्वरूप एक विषाल विस्फोट हुआ, जिसे बिग बैंग कहा गया। वास्तव में ये नाभिकीय विखण्डन की प्रक्रिया थी जिसकके कारण ब्रम्हाण्ड का केन्द्रित पदार्थ विखण्डित होकर ब्रम्हाण्ड के केन्द्र के चारों ओर फैलने लगा। विखण्डित होने वाले पदार्र्थोें में आज भी नाभिकीय संलयन की प्रक्रिया चल रही है। फलस्वरूप  इन पिण्डों में आज भी उष्मा तथा प्रकाष के रूप में ऊर्जा विद्यमान है इसीलिए इन विखण्डित पदार्थों को तारा कहा जाता है। इस प्रकार के असंख्य तारों के निर्मित होने से ब्रम्हाण्ड की उत्पत्ति हुई। जार्ज लेमेटरे के अनुसार वर्तमान समय में हमारा ब्रम्हाण्ड विस्तार कर रहा है। इस कथन की पुष्टि 1970 के दषक में अमेरिकी वैज्ञानिकों ने भी की। जिनके अनुसार ब्रम्हाण्ड में उपस्थित तारों की कक्षा में निरन्तर विस्तार हो रहा है। जिसके कारण ये समस्त पदार्थ ब्रम्हाण्ड के केन्द्र से दूर होते जा रहे हैं, अर्थात ब्रम्हाण्ड का विस्तार ठीक उसी प्रकार से हो रहा है जिस प्रकार से गुब्बारे में हवा भरने पर उस गुब्बारे के आकार में विस्तार होता है। वैज्ञानिकों ने यह भी माना है कि भविष्य में एक ऐसी स्थिति अवष्य आयेगी जब ब्रम्हाण्ड में उपस्थित ये समस्त पदार्थ ध्वस्त होकर एक ही बिन्दु अर्थात ब्रम्हाण्ड के केन्द्र में समाहित हो जायेंगे। इस प्रक्रिया को वैज्ञानिकों ने बिग-क्रंच का नाम दिया है। बिग-क्रंच के बाद केंद्रित पदार्थ में पुनः विखण्डन होगा अर्थात बिग बैंग होगा। वैज्ञानिक ऐसा मानते हैं कि यह चक्रिय प्रक्रिया है, जिसके कारण बिग-बैंग के बाद बिग-क्रंच तथा बिग-क्रंच के बाद बिग-बैंग पुनः होता रहेगा। यही सत्य भी है, क्योंकि विनाष के बाद सृजन तथा सृजन के बाद विनाष ही प्रकृति का नियम है।
प्रिय पाठकों अब तक मैने आपके मस्तिषक में ब्रम्हाण्ड के निर्माण की प्रक्रिया का चित्र खींचा और अब आगे इसी प्रक्रिया को बढ़ाते हुए मैं आपको अपने सौरमण्डल की सैर पर ले चलता हूॅं, जहां हम विभिन्न ग्रहों की सैर करेंगे। इससे पहले कि हम इस अनजाने व रोमांचक सफर पर निकलें हम यह जान लें कि इसका इतिहास क्या है?

बात बड़ी सामान्य सी है कि जिस प्रकार बिगबैंग की घटना हुई और ब्रम्हाण्ड का निर्माण हुआ उसी प्रक्रिया के दौरान उन्ही पदार्थों के सूक्ष्म भाग के संग्रहीत होने से हमारी आकाष गंगा का निर्माण हुआ, और उसी आकाष गंगा के रंचमात्र पदार्थ से हमारे सूर्य की रचना हुई और इसी सुर्य से ही निकलकर विभिन्न ग्रहों की रचना हुई। इन्हीं ग्रहों से निकले पदार्थों से ही उपग्रहों की रचना हुई। और कुछ ऐसे पदार्थ जो कि न तो किसी ग्रह का रूप ले पाये और न ही किसी उपग्रह का रूप ले पाये वे आज भी सुर्य के चारों तरफ ग्रहों की भांति चक्कर लगा रहे है ये क्षुद्र ग्रह की श्रेणी में आते हैं। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि ये क्षुद्र ग्रह अभी ग्रह बनने की प्रक्रिया में चल रहें है भविष्य में ये भी किसी ग्रह का रूप ले सकते हैं। उपरवर्णित समस्त आकाषीय पिण्डों अर्थात ग्रहों उपग्रहों तथा क्षुद्रग्रहों इत्यादि से ही सौरमण्डल की रचना हुई है। तो ये था हमारे सौरमण्डल का संक्षिप्त इतिहास। मैं समझ रहा हूॅं कि अब तक आप लोग सौरमण्डल के सैर के लिए अपनी पुरी तैयारी भी कर लिये होंगे। तो आइये हम चलते है सौरमण्डल के एक रोमांचक यात्रा पर.............  
अब हम अपने सौरमण्डल में हैं। इससे पहले कि हम यहां किसी सदस्य के घर चलें आइये सबसे पहले इस परिवार के मुखिया अर्थात सूर्य से मिल लेते हैं। ये हैं सूर्य जो हमारे सौरमण्डल के मुखिया, जनक, केन्द्र, ऊर्जा श्रोत एवं जीवन-श्रोत हैं। ये एक मध्यम आयु तथा मध्यम भार के तारा हैं। ये इस समय पूर्ण संतुलन की दषा में हैं, अर्थात यह न तो फैल रहा है न ही सिकुड़ रहा है। इनके गुरूत्वाकषर्ण बल तथा केन्द्र में नाभिकीय दाह से उत्पन्न वाह्य या केन्द्रापसारी बल के मध्य पूर्ण संतुलन स्थापित है जिसके फलस्वरूप इनके पड़ोस में जीवन सम्भव है। इस दृष्टि से हम पृथ्वीवासी भाग्यषाली हैं। यदि सुर्य छोटा होता तो इसके केन्द्र में नाभिकीय दाह न होता जिससे पृथ्वी पर सदैव सांध्य प्रकाष;जूपसपहीजद्ध तथा पाला;तिवेजद्धकी स्थिति बनी रहती। इसके विपरीत यदि सूर्य वर्तमान की अपेक्षा अधिक बड़े आकार का होता तो इसके तीव्र दाह से ग्रहों पर जीवन सम्भव न होता। पृथ्वी पर मिलने वाले 60 से अधिक तत्व सौर स्पेक्ट्रम में मिलते हैं। सूर्य के भार का लगभग तीन-चैथाई भार हाइड्रोजन का है तथा सूर्य की संरचना का 98 प्रतिषत हाइड्रोजन तथा हीलियम का बना है।
सूर्य के मध्यभाग अर्थात प्रकाषमण्डल के ऊपर उसका वर्णमण्डल रहता है, जहां अत्यंत तप्त गैसों की प्रचण्ड आंधी उठा करती है। जो अधिकतर पूर्ण सूर्यग्रहण पर दिखाई देती है। उसी समय उसकी माप भी ली जा सकती है। यही कारण है कि विष्व के तमाम खगोलविदों को पूर्ण सूर्यग्रहण का बड़ी बेसब्री से इंतजार रहता है। सूर्यग्रहण के समय सूर्य से सम्बंधित अन्य जानकारी भी हासिल होती है। यह तप्त गैसों की आंधी सूर्य की सतह से उठती हुई लपटों के द्वारा बनती है। सूर्य से उठती हुई इन रक्त ज्वालाओं को सौर ज्वालाएं कहते हैं। हमें कभी-कभी सूर्य की सतह पर एक प्रकार के धब्बे दिखाई पड़ते हैं जिन्हेें सौर्यकलंक कहा जाता है। 
वास्तव में सौर्यकलंक प्रकाषमंडल के वे क्षेत्र होते हैं जहां का तापमान चारों के तरफ के तापमान की तुलना में 1500ज्ञ कम होता है। सर्वप्रथम गैलीलियो ने बताया कि नग्न आंखों से भी दिखाई पड़ने वाले सौरकलंक सूर्य के धरातल पर बनते हैं। एक सौरकलंक का जीवन-काल कुछ घंटों से लेकर कुछ माह तक होता है। ये सर्वप्रथम लगभग 1500 किमी. ब्यास के छिद्र सदृष दिखते हैं। इनके आन्तरिक काले भाग को अम्ब्रा तथा चारों ओर स्थित अपेक्षाकृत कम काले भाग को पेनम्ब्रा कहा जाता है। अधिकतम सौरकलंक लगभग 11.1 वर्ष के अन्तराल पर होता है, किन्तु यह 8 से 16 वर्ष के मध्य विचलित होता है। क्यों पाठकों है न आष्चर्य की बात, हम मनुष्य अपने आपको कलंकरहित कहने से कभी नहीं चुकते जबकि सच्चाई यह है कि अपार तेजवान, ऊर्जावान होते हुए सूर्य इस कलंक से नहीं बच सका तो हमारी क्या विसात है। 
सूर्य का जो भाग हमें आंखों से दिखाई देता है उसे प्रकाषमण्डल कहते हैं। इसका ताप अत्यंत प्रचण्ड रहता है। सूर्य के गर्भ का ताप चार करेाड़ डिग्री सेण्टीग्रेट हो सकता है। यदि सूर्य से निकलने समस्त गर्मी केंद्रीभूत कर दिया जाये तो 15 करोड़ किमी. लम्बी तथा सवा दो किमी. मोटी बर्फ की चट्टान एक सेकेण्ड में गलकर पानी हो जायेगी और आठ सेकेण्ड में भाप बनकर उड़ जायेगी। हम सूर्य की गर्मी का अंदाजा इस बात से भी लगा सकते हैं कि यदि सूर्य के पिण्ड का एक पिन के सिर के बराबर भाग हमारी पृथ्वी आ गिरे तो उसकी गर्मी से 1500 किमी. के आसपास की समस्त वस्तुएं भस्म हो जायेंगी। सूर्य के प्रकाष का अंदाजा लगाते हुए जेम्सजीन्स कहते हैं कि यदि 6 लाख चन्द्रमा एकत्रित कर दिये जायें तो कहीं जाकर सूर्य के बराबर प्रकाष मिल सकेगा। सूर्य के चारों ओर हमें एक पट्टी सी दिखाई देती है जिसे सूर्य का मुकूट कहते हैं। सूर्य का मुकूट लाखों किमी तक इसकी सतह को घेरे रहता है, इसमें बहुत अधिक प्रकाष होता है। यह मुकूट सूर्य की सतह के बाहर है इसीलिए सूर्य के निजी अक्ष भ्रमण के साथ यह नहीं घूमता है। सूर्य के इस मुकूट की उत्पत्ति शायद उन परमाणुओं और विद्युतकणों से है जो सूर्य की ज्वालाओं द्वारा हर समय वेग के साथ बाहर फेंके जाने से सूर्य की सतह के चारों ओर फैलते रहते हैं। सूर्य के प्रकाष के तेजी के कारण यह हमेषा दिखाई नहीं देता, किन्तु सूर्य-ग्रहण के समय बिल्कुल साफ दिखाई पड़ता है, और इसके प्रकाष के कारण हमारी पृथ्वी काफी प्रकाषमान रहती है। 
मुझे लगता है अब आप लोग सूर्य की गर्मी से बहुत ही परेषान हो गये हैं और काफी कुछ यहां घुम भी लिया अब यहां और अधिक रूकना समय और सेहत की बरबादी के अलावा और कुछ नहीं है। अतः एक बुद्धिमान पर्यटक की भांति हमें अपने यान को मोड़ लेते हैं और चलते हैं परिवार के अन्य सदस्य ग्रहों के यहां। 
प्रिय पाठकों आइये इनसे मिलें जो अपने पिता सूर्य के बिल्कुल पास बैठे हैं। जी हां, ये हैं बुध, जो सूर्य के सबसे छोटे पुत्र हैं। छोटी संतानें अपने मां-बाप की सबसे प्रिय होती हैं, शायद इसीलिए बुध अपने पिता से बिल्कुल सटकर बैठा है। बुध का हुलिया देखने के बाद जो निष्कर्ष हम निकालते हैं वह कुछ इस प्रकार है....
इसका ब्यास लगभग 5000 किमी. है। आयतन में यह पृथ्वी का बिसवां भाग है। पहले यह विष्वास किया जाता था कि बुध ग्रह की कक्षीय तथा अक्षीय दोनों गतियां बराबर अर्थात अट्ठासी-अट्ठासी दिन की होती हैं, परंतु बाद में राडार परीक्षणों से स्पष्ट हुआ कि इसकी कक्षीय गति तो वही है परंतु अक्षीय गति 58.65 दिन की ही होती है। यहां एक भाग में अधिक गर्मी है तो दूसरे में अत्यंत ही ठण्डक है। बुध प्रतिदिन सूर्यादय के दोेेेेेेेेेे घंटे पहले उदय होता है, इसीलिए इसे भोर का तारा कहते हैं। यह क्षितिज से ऊपर नहीं उठ पाता है। बुध अधिक चमकीला ग्रह है। चन्द्रमा की तरह बुध की भी कलाएं दिखाई देेती हैं। जब यह पृथ्वी ओर सूर्य के सीध में होता है तो उसका पूर्ण प्रकाषित पिण्ड दिखाई देता है। किंतु वह जब पृथ्वी और सूर्य के बीच में आ जाता है तो वह हमें दिखाई नहीं देता किंतु ऐसा बहुत कम ही होता है, क्योंकि इसकी धूरी सूर्य के मार्ग से तिरछी रहती है।  जब कभी बुध सूर्य के सामने पड़ जाता है तो वह सूर्य पर छोेटे से गोल धब्बे के रूप  में दिखाई देता है। बुध का आकार अत्यंत छोटा है तथा वहां तापमान भी अधिक है इसी कारण यहां वायुमण्डल नहीं पाया जाता। वायुमण्डल की अनुपस्थिति के कारण तथा अन्य कई कारणों से ही यहां जीवन नहीं पाया जाता। बुध ग्रह सबसे अधिक तापंातर वाला ग्रह है। वैसे सूर्य के सबसे नजदीक होने के कारण यहां का तापमान सर्वाधिक होना चाहिए परंतु इस मामले में शुक्र इससे आगे है, शुक्र ग्रह का तापमान सर्वाधिक है ऐसा क्यों इसका  कारण जब हम शुक्र के पास चलेंगे तो उसी से पुछ लेंगे। बुध ग्रह की अपनी कोई संतान अर्थात उपग्रह नहीं है।
मुझे लगता है कि हम लोगों ने बुध महाषय का काफी समय लिया आइये इनका धन्यवाद बोलें और यहीं से थोड़ी दूरी पर बैठे हैं शुक्र जी, उनसे मिलते हैं। जो कि काफी चमक रहे हैं शायद अभी-अभी नहा धोकर बैठे हैं। 
ये हैं सौरपरिवार के सबसे साफ-सुथरे तथा चमकीले सदस्य शुक्र जी। जोकि भारतीय पौराणक कहानियों में शुक महराज के नाम से प्रसिद्ध हैं। ये राक्षसों का सदा हित चाहने वाले आचार्य शुक्राचार्य जी हैं। इनके तिव्र चमक के बारे में इनसे पुछने पर ये बता रहें कि इनके वायुमण्डल में कार्बनडाईआक्साइड की मात्रा सवार्धिक है जिसके कारण यहां प्रेषर कुकर दषा या ग्रीन हाउस प्रभाव उत्पन्न होता है। जिसके कारण यहां का तापमान दिन प्रतिदिन बढ़ ही रहा है। इसी बढ़ते हुए तापमान के कारण ही यह अपने परिवार में सबसे चमकीला ग्रहा है। अधिक चमकीला होने तथा ऐसा प्रतीत होने कि जैसे इसमें खुद का प्रकाष है यह तारा की संज्ञा भी पा जाता है। चूंकि यह भोर तथा संध्या दोनों समयों में दिखाई देता है इसीलिए इसे भोर तथा संध्या का तारा भी कहते हैं। शुक्र का आकार तथा औसत घनत्व पृथ्वी के लगभग बराबर है, तथा ब्यास 12872 किमी. है जो कि पृथ्वी के लगभग बराबर है इसीकारण इसको पृथ्वी की जुड़वा बहन भी कहते हैं। इसकी कक्षीय अवधि 226 दिन तथा अक्षीय अवधि 243 दिन है, अर्थात इसका एक वर्ष इसके एक दिन से छोटा है। ध्यातब्य है कि- जितने समय में कोई ग्रह अपने पिता तारे की एक परिक्रमा पूरी कर लेता है वह समय उस ग्रह का एक वर्ष होता है। इसीतरह कोई ग्रह जितने समय में अपने धुरी पर एक परिक्रमा कर लेता है उस समय को उस ग्रह का एक दिन कहते हैं। ग्रहों का अपने धुरी पर घूमना परिभ्रमण तथा अपनी कक्षा में सूर्य के चारों तरफ घूमना परिक्रमण गति कहलाती है।  शुक्र ग्रह की जो एक और खास बात है वह यह कि शुक्र अपनी धुरी अर्थात कक्ष पर घड़ी की सुई के अनुरूप;बसवबा ूपेमद्ध या पुरब से पष्चिम की तरफ घूमता है। पृथ्वी की तरह यहां भी वायुमण्डल है , इसमें भी बादल उठते है, जिसके कारण उस पर कभी-कभी हल्के रंग के भद्दे धब्बे दिखाई देते हैं। बुध की तरह शुक्र की भी अपनी कोई संतान अर्थात उपग्रह नहीं हैं।
पाठकों मुझे लगता है कि अब आप लोग शुक्र का भी काफी हद तक निरीक्षण व यात्रा कर लिए तथा यात्रा से काफी थक व उब भी चुके होंगे अतः अब हम थोड़ा विश्राम के लिए चलते हैं पृथ्वी पर जहां का वातावरण आपको अत्यंत ही सुखद व थकावरहित महसूस होगा
हमारी पृथ्वी अपने परिवार की सबसे अनुपम सदस्य है............
                                          
ं 
                                   .........क्रमशः