मैंने एक सपना देखा है, सबके लिए शांति हो, काम हो, रोटी हो, पानी और नमक हो। जहां हम सबकी आत्मा, शरीर और मस्तिष्क को समझ सके और एक-दूसरे की जरूरतों को पूरा कर सकें। ऐसी दुनिया बनाने के लिए अभी मीलों चलना बाकी है। हमें अभी चलना है, चलते रहना है।- नेल्सन मंडेला
''संघर्ष ही मेरा जीवन है, मैं स्वाधीनता की प्राप्ति के लिए जीवन पर्यन्त संघर्ष करता रहूँगा'' के उद्धोषक नेल्सन मण्डेला बीसवीं शताब्दी के इन अंतिम वर्षों में विश्व के एक सर्वाधिक चर्चित व्यक्ति बन गये । वस्तुत: यदि हम कहें कि वह स्वजाति के उत्थान और वर्णभेद जैसी घृणा के विरुध्द संघर्ष के प्रतीक बन गये, तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। इसी उद्देश्य के लिए उन्हें एक चौथाई शताब्दी से भी अधिक समय के लिए कारावास की यन्त्रणाओं का सामना करना पड़ा। किन्तु ये कठोर यन्त्रणाएं उनके मनोबल को डिगा पाने में असमर्थ रहीं। अपनी अदम्य इच्छाशक्ति और अप्रतिम साहस के कारण आज वह विश्व के एक अद्भुत जननायक बन गये। आज जहां एक ओर अनन्त का भी अन्त पाने के प्रयास हो रहे हैं, मानव ने अपनी सुखसाधना के लिए अनेक असम्भव प्रतीत होने वाले कार्यों को भी संभव कर दिखाया है, वहीं विश्व की विध्वंसात्मक प्रवृत्तियां उसके सब किये कराये पर पानी फेर देने को उद्यत हैं। जहां एक ओर विश्व राष्ट्र जैसी उदात्त कल्पनाएं हैं और 'मनुष्य मात्र बन्धु है' जैसे श्रेष्ठ विचार हैं, वहीं मान्यता के शत्रु धर्म, वर्ण, जाति आदि का आश्रय लेकर इन समस्त उपलब्धियों को अर्थहीन करने की चेष्टा कर रहे हैं। साम्प्रदायिकता और क्षेत्रीय पृथकतावाद आज विश्व के लिए सबसे बड़ी समस्याएं बन गयी हैं। साम्प्रदायिक वैमनस्य एक अन्तर्राष्ट्रीय समस्या है। संप्रदायों-धर्मों की परस्पर प्रतिद्वन्द्विता, जातिगत विद्वेष, श्वेत-अश्वेत का भेद आदि इसी भावना के अनेक रूप हैं। वर्तमान में दक्षिण अफ्रीका श्वेत (गोरे)-अश्वेत (काले) के बीच भेद भावना का प्रत्यक्ष उदाहरण है। इसी भावना को समाप्त कर मानव मात्र को समानता का अधिकार प्रदान कराने के लिए नेल्सन मण्डेला ने संघर्ष-मार्ग का वरण किया है।